आलमनगर प्रखंड मुख्यालय स्थित ड्योढ़ी की अति प्राचीन ठाकुरबाड़ी में करीब 200 वर्षों से चली आ रही झूलनोत्सव की परंपरा इस वर्ष भी श्रद्धा और उल्लास के साथ निभायी गयी. सावन पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण और राधा के पांच दिवसीय झूलनोत्सव का समापन विशेष पूजा-अर्चना के साथ हुआ. इस अवसर पर ठाकुरबाड़ी को आकर्षक ढंग से सजाया गया था और भगवान के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे.
दो सदी पुरानी परंपरा आज भी नहीं टूटी
इस प्राचीन ठाकुरबाड़ी में झूलनोत्सव की परंपरा करीब 200 वर्षों से चली आ रही है. स्थानीय लोगों के बीच इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है और हर वर्ष श्रद्धालुओं को झूलनोत्सव का इंतजार रहता है.
राजघराने के सदस्य सर्वेश्वर प्रसाद सिंह आज भी अपने पूर्वजों की इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने बताया कि करीब दो सदी पूर्व उनके पूर्वजों ने ठाकुरबाड़ी का निर्माण कराया था. यहां भगवान श्रीकृष्ण-राधा, सीता-राम सहित अन्य देवी-देवताओं की प्राचीन अष्टधातु की प्रतिमाएं स्थापित हैं.
चांदी की पालकी में विराजते हैं राधा-कृष्ण
झूलनोत्सव के दौरान विशेष धार्मिक परंपराओं का पालन किया जाता है. सावन की एकादशी को भगवान श्रीकृष्ण और राधा को विशेष रूप से सजायी गयी चांदी की पालकी पर विराजमान कराया जाता है. इसके बाद विधिवत पूजा-अर्चना कर भगवान को झूला झुलाया जाता है.
पांच दिवसीय इस आयोजन के दौरान ठाकुरबाड़ी में भक्ति और उत्सव का माहौल बना रहता है. भगवान के श्रृंगार और झांकी के दर्शन के लिए आसपास के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं.
पूर्णिमा की शाम 108 व्यंजनों का लगता है भोग
सावन पूर्णिमा की संध्या झूलनोत्सव का विशेष आकर्षण रहती है. इस अवसर पर भगवान की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और विभिन्न फलों के साथ 108 प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित किया जाता है.
पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया जाता है. महाप्रसाद पाने के लिए बड़ी संख्या में भक्त ठाकुरबाड़ी पहुंचते हैं.
भजन-कीर्तन और झांकियों से भक्तिमय रहता है परिसर
झूलनोत्सव के दौरान ठाकुरबाड़ी में भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है. भगवान की लीलाओं और धार्मिक प्रसंगों पर आधारित विभिन्न झांकियां भी प्रस्तुत की जाती हैं.
भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों में श्रद्धालुओं के साथ आसपास के ग्रामीण भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं. शाम होते ही ठाकुरबाड़ी परिसर भक्तों की भीड़ से गुलजार हो उठता है.
आस्था के साथ विरासत को भी सहेज रही ठाकुरबाड़ी
ड्योढ़ी की यह प्राचीन ठाकुरबाड़ी केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि क्षेत्र की धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक बनी हुई है. करीब 200 वर्षों से चली आ रही झूलनोत्सव की परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभायी जा रही है.
राजघराने के सदस्य और स्थानीय श्रद्धालु मिलकर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. यही वजह है कि सावन आते ही आसपास के लोगों में झूलनोत्सव को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिलता है और हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर राधा-कृष्ण का आशीर्वाद लेते हैं.
