बदहाल शिक्षा व जलमिनार, लोगों को रुला रहा जार-जार फोटो – मधेपुरा 07,08कैप्शन – शोभा की वस्तु बना जल मिनार, एचएस कॉलेज-उदासीनता . नागरिक सुविधाओं से वंचित है अनुमंडल मुख्यालय के लोग प्रतिनिधि, उदाकिशुनगंज उदाकिशुनगंज को अनुमंडल का दर्जा तो दे दिया गया. लेकिन विकास करने के बजाय ग्रामीण अंचल जैसा शहर लग रह है. यानी शहर है शहर की तलाश है. चूंकि मूलभूत सुविधाओं से आम जन वंचित है. लोगों को स्वच्छ व लौह मुक्त पानी उपलब्ध कराये जाने को लेकर मुख्यालय में पीएचइडी द्वारा लगभग 99 लाख 41 हजार छह सौ रूपये की लागत से जलमिनार व अन्य उपकरण का निर्माण 2011 में करवाया गया था. जिसकी क्षमता 75 हजार लीटर प्रतिदिन शुद्ध पानी मुख्यालय के लोगों को उपलब्ध कराने की क्षमता थी. लोगों के घर – घर तक पानी पहुंचाने के लिए उस समय दूसरे संवेदक के माध्यम से लाखों रुपये खर्च कर पाइप बिछया गया था. लेकिन, विभागीय पदाधिकारी लापरवाही के कारण एक भी व्यक्ति के घर तक पानी सप्लाई पाइप नहीं पहुंचाया जा सका. लेकिन, अंतिम बिल विपत्र पदाधिकारी द्वारा पास कर दिया गया. लेकिन यह अफसोस की बात रही है कि जलमिनार से एक बूंद पानी लोगों को नहीं मिल सका. कहा जाय कि मोटर से जल मिनार को ही पानी उपलब्ध नहीं कराया गया. इस तरह खुद जल मिनार प्यासा रह गया. एक बूंद शुद्ध पानी के लिए लोगों का तरस कर रह जाना स्वाभाविक ही है. प्रशासनिक उदासीनता के कारण ही पूर्व में भी यह योजना धरातल पर नहीं उतर सका था. 1987 में तीन लाख 75 हजार की लागत से लौह संयंत्र के माध्यम से मुख्यालय के लोगों को लौह मुक्त पानी उपलब्ध कराये जाने के लिए काम किया गया था. लेकिन वह योजना भी सफलीभूत नहीं हो सका. जल निकासी व्यवस्था नदारद गंदा पानी बहाव के लिए बाजार में पक्की नाला तक नहीं है. घरों के अंदर चापाकल से उपयोग में लाये जाने वाले अतिरिक्त पानी बहाव के लिए नाला नहीं रहने से लोग रात के अंधेरे में एकत्रित गड्ढा पानी रोड पर फेंक देते है. जिससे प्रदूषण का फैलना स्वाभाविक ही है. इस कारण लोगों में संक्रामक रोग फैलने की संभावना बनी रहती है. खास कर बरसात के मौसम में जल जमाव की समस्या आम बात हो जाती है. वर्तमान में तो मुख्य मार्ग इतना उंचा कर दिया गया है कि बरसात के मौसम में पानी दुकान में प्रवेश कर सकता है. जिससे निजात दिलाने के लिए नाला निर्माण कराया जाना जरूरी. उच्च शिक्षा के लिए शिक्षण संस्थान नहीं छात्राओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मुख्यालय में एचएस कॉलेज की स्थापना 1956 ई में की गयी थी. लंबी अवधी के बाद राज्य सरकार द्वारा एक अप्रैल 1977 को अंगीभूत किया गया. परंतु कॉलेज में शिक्षक कर्मचारियों का अभाव है. अंगीभूत कॉलेज में मात्र कला संकाय की पढ़ाई होती है. उसमें भी मात्र अर्थशास्त्र, नागरिक शास्त्र, तर्क शास्त्र, इतिहास, हिंदी, मैथली, उर्दू व अंग्रेजी विषय की पढ़ाई होती है. लेकिन, विवि प्रशासन की उदासीनता के कारण वर्षों से उर्दू तक शास्त्र, अंग्रेजी जैसे अन्य विषय में प्राध्यापक तक पद स्थापित नहीं है. लेखापाल, सहायक, नाइट गार्ड का भी पद रिक्त पड़ा है. एक आदेश पाल से सारे कार्यों का निष्पादन कराया जाता है. कॉलेज की संपत्ति की भी सुरक्षा भगवान भरोसे है. ऐसे में छात्रों को उंची व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिल सकेंगा. खास कर गरीब छात्रों को उच्च शिक्षा से वंचित होना पड़ता है या तो प्राइवेट कॉलेज प्रबंधन के शोषण का शिकार होना पड़ता है. जबकि यह कॉलेज अनुमंडल का एक मात्र अंगीभूत इकाई है. इस तरह उच्च शिक्षा के नाम पर कहा जाय तो नाम मात्र का है. पढ़ाई तो होती ही नहीं है. नारी शिक्षा के लिए सरकार गंभीर नहीं नारी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सरकार गंभीर नहीं दिख रही है. यही वजह रहा है कि सरकार की ओर से महिलाओं को शिक्षा देने के लिए प्रबंध नहीं किया जा सका है. मुख्यालय में नारी शिक्षा के नाम पर मात्र कन्या मध्य विद्यालय है. सरकारी स्तर पर नारी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ओर कोई व्यवस्था नहीं किया जा सका है. हां नारी शिक्षा के नाम पर मुख्यालय में एक इंटर स्तरीय कॉलेज व एक हाई स्कूल निजी प्रबंधन द्वारा संचालित है. जहां पठन पाठन का कार्य नहीं ही होता है. हां अधिक रूपये लेकर परीक्षा फॉर्म जरूर भरवाया जाता है. इस तरह अनुमंडल मुख्यालय मूल भूत सुविधाओं से वंचित है. यहां वो सब कुछ होना चाहिए. जो मानव हित से सरोकार रखता हो. इसके लिए विधायक या सांसद कभी सोचने की जरूरत ही नहीं समझा. इस तरह विकास से वंचित अनुमंडल मुख्यालय विकास का बाट जौहता रहा है.
बदहाल शक्षिा व जलमिनार, लोगों को रुला रहा जार-जार
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