मधेपुरा : देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय–अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित मैराथन प्रतियोगिताओं में सूबे का नाम रोशन करने वाले मधेपुरा के मिल्खा सिंह (सिंहेश्वर प्रखंड के बुढ़ावे गांव निवासी पवन कुमार) एक अदद जूते, ट्रेक सूट व फूड सप्लिमेंट के बिना ट्रेक पर दौड़ने को मजबूर हैं.
आर्थिक रूप से काफी पिछड़े होने के बाद भी पवन ने पांच फरवरी 2012 को कोलकाता हाफ मैराथन में चौथा, 20 जनवरी 2013 को मुंबई मैराथन में पांचवां व 21 जुलाई 2013 को जेनइनडोरेंस लद्दाख मैराथन (42 किमी) में पहला स्थान हासिल कर खेल के जानकारों को हैरत में डाल दिया.
विशेषज्ञों का कहना है कि मैराथन की तैयारी में काफी स्टेमिना की जरूरत होती है. बेहतर फूड सप्लिमेंट व सुविधाओं के बिना इसे जीतना तो दूर, इसकी स्तरीय तैयारी भी असंभव है. पर पवन ने दूध–सत्तू और सामान्य खाद्य पदार्थो का सेवन कर घंटों मैदान में पसीना बहाया और अपनी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर साबित किया. पर सवाल उठता है कि बिना आर्थिक मदद के वह कब तक इस तरह के बड़े आयोजनों में हिस्सा ले पायेगा.
पवन के पिता नारायण चौहान ने बताया कि बेटे की लगन को देख उन्होंने और उनके पूरे परिवार ने उसका साथ दिया. लद्दाख मैराथन में हिस्सा लेने जाने के लिए दुधारू गाय को महज 11 हजार रुपये में बेच दिया. हालांकि उसके बाद एसपी सौरभ कुमार शाह ने 15 हजार व डीएसपी मुख्यालय द्वारिका पाल ने भी छह हजार रुपये की मदद की.
* और बन गया हीरो
मौसम खराब होने की वजह से श्रीनगर से लद्दाख पहुंचने में उसे काफी परेशानी हुई. पर कहते हैं ना, जिसके हौंसले बुलंद होते हैं खुदा भी उनके साथ होता है. अतंत: पवन येलो जैकेट रेसिंग डाट कॉम द्वारा प्रायोजित लद्दाख मैराथन (42 किमी) का हिस्सा बना और 03 घंटा 15 सेकेंड में दौड़ पूरी कर विजेता बना.
पवन के कोच शंभु कुमार ने बताया कि कठिन सफर ने पवन को दौड़ने से पहले ही थका दिया था, पर हौंसला बढ़ाने पर वह अपनी थकान को भूल दौड़ के लिए तैयार हो गया. बताते चलें कि मुंबई मैराथन में पांचवां स्थान हासिल करने के बाद स्थानीय सांसद व तत्कालीन डीएम से मदद की गुहार लगायी गयी थी, पर पवन को आश्वासन के सिवा और कुछ नहीं मिला.
* कैसे शुरू हुआ सफर
जेपी कॉलेज में नामांकन कराने के बाद वहां साथियों को खेलते देख पवन के मन में भी खेलने की इच्छा जगी. उसने संबंधित लोगों से निवेदन किया तो उसे खेल का हिस्सा बनाने से साफ मना कर दिया गया. यह बात उसके दिल पर लग गयी और उसने इसे चुनौती के रूप में ले लिया. कॉलेज ग्राउंड से निकलने के बाद वे खेल प्रशिक्षक शंभु कुमार से मिले और मदद की गुहार लगायी.
प्रशिक्षक ने उसके अंदर की प्रतिभा को पहचाना और उसे अपना शिष्य बना लिया. इसके बाद से पवन ने कभी पलट कर नहीं देखा. उसके खाने के लिए चिनिया बादाम, सोयाबीन आदि की व्यवस्था भी प्रशिक्षक ने ही की. स्थानीय स्तर की प्रतियोगिताओं में जीतते जाने के कारण वह पहले से भी अधिक पसीना बहाने लगा. स्टेमिना बनाये रखने के लिए उसे और अधिक पॉस्टिक पदार्थो के सेवन की दरकार थी.
डायन की समस्या को दूर करने के लिए उसके पिता ने अपनी जमीन गिरवी रख दी. आज भी वह उस जमीन नहीं छुड़ा पायें हैं. पवन रोज सिंघेश्वर से सहरसा दौड़ कर जाता है और आता है.
* खेल कूद के साथ–साथ पढ़ाई भी
स्टेडियम में प्रतिदिन 30-35 किमी दौड़ लगाने वाला पवन पढ़ाई में भी अव्वल है. फिलहाल वह टीपी कॉलेज से अंग्रेजी विषय से एमए कर रहा है. बकौल पवन, सरकारी उदासीनता के बावजूद खेल और पढ़ाई दोनों जारी है. जरूरतों को पूरा करने के लिए टय़ूसन पढ़ाकर पैसे का जुगाड़ करता है. कालेज से भी कोई मदद नहीं मिलती.
* दी जायेगी हर संभव मदद
डीडीसी मोहन राम ने बताया कि पवन को हरसंभव मदद दी जायेगी. जिला स्तर पर उसे सम्मानित भी किया जायेगा.
* आर्थिक मदद नहीं मिली तो बड़ी प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं ले पायेगा मधेपुरा का ‘मिल्खा सिंह’
* राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कई फुल व हॉफ मैराथन का बन चुका है हिस्सा
लद्दाख मैराथन में हिस्सा लेने के लिए महज 11 हजार में बेचनी पड़ी थी दुधारू गाय
स्पोर्ट्स जूते, ट्रेक सूट व फूड सप्लिमेंट के बिना रोज 30-35 किमी की दौड़ लगाता है पवन
* दूध–सत्तू और सामान्य खाद्य पदार्थो का सेवन कर बड़े–बड़ों को धूल चटाते देख खेल विशेषज्ञ भी हैरान
* कहा– कमाल का है पवन मैराथन की तैयारी में काफी स्टेमिना की होती है जरूरत
* बिना फूड सप्लिमेंट व सुविधाओं के इसे जीतना तो दूर, इसकी स्तरीय तैयारी भी असंभव
* डीडीसी बोले–पवन को दी जायेगी हर संभव मदद सम्मानित भी किया जायेगा
