लोक आस्था के महापर्व में मिट जाता है समाज में अमीर और गरीब का भेद
मधेपुरा : आज महापर्व छठ है. नदी और तालाब के घाट सजाये जा रहे हैं. सब मिल कर तैयारी कर रहे हैं. सबके घाट एक से ही. धरा सबकी… जल सबका और सूर्य देव भी सबका. सब एक समान. घाट पर गरीब व अमीर का भेद नहीं है. सबके सूप के प्रसाद की महत्ता एक समान. छठी मइया के सब संतान. यह बाजार का पर्व नहीं…लोक पर्व है! आमजन की आस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि दिल्ली सहित पूरे भारत और विदेश से परदेसी बाबूओं का पिछले तीन दिनों से लगातार आना जारी है. सभी ट्रेनें भरी हैं.
बस, टेंपो, टैक्सी सब के सब खचाखच भरे हुए. हवाई जहाज को भी फुर्सत नहीं. सुबह तीन बजे से ही भारी भरकम बैग और सूटकेस कंधे पर उठाये लोग अपने गांव की ओर भागे जा रहे हैं. कौन अमीर और कौन गरीब. उनमें सुबह की प्रतीक्षा का सब्र नहीं. बेहद सादगी से भरे लोक आस्था के इस महान पर्व को धर्म के नजरिये से देखें या आस्था के पहलू से, इसमें उतनी ही विशालता नजर आती है. न आडंबर, न पैसा और न स्टेटस. छठ घाट पर सब बराबर. पिछले कई दिनों से बाजार में खरीदारी के लिए भीड़ उमड़ी पड़ी है.
कंद – मूल में अदरक, हल्दी, सुथनी,
अल्हुआ, मूली है. इसके अलावा नारियल, ईंख और कुछ फल आदि बस यही कुछ मुख्य खरीदारी है छठ पर्व की. पिछले दो महीने से बांस के शिल्पकार कहे जाने वाली मरीक जाति के लोग दिन रात लग कर सूप तैयार कर रहे थे. जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हैं. पंजाब में मजदूरी कर लौटा सिंहेश्वर का बिजेंद्र भी यही खरीद रहा है और शहर के प्रमुख व्यवसायी में शुमार होने वाले इंद्रदेव स्वर्णकार को भी इसी की दरकार है. वाह छठ मइया! जय हो आपकी महिमा अपरंपार!
