हलसी का मनोकामना सिद्ध दुर्गा धाम : फूस की कुटिया से सवा करोड़ का भव्य मंदिर तक रही मां की यात्रा
Lakhisari News : ताड़ के पत्तों से बने एक छोटे से पंडाल से शुरू हुई आस्था की कहानी आज सवा करोड़ रुपये के भव्य मंदिर में बदल चुकी है. हलसी का यह मंदिर सिर्फ पूजा का स्थल नहीं, बल्कि सामूहिक एकता, समर्पण और जनसहयोग की अद्भुत मिसाल है.
हलसी (लखीसराय) से केशव कुमार की रिपोर्ट
Lakhisari News : लखीसराय जिले के हलसी प्रखंड मुख्यालय में स्थित मां मनोकामना सिद्ध वैष्णवी दुर्गा मंदिर आज हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. करीब 63 वर्षों के सफर में इस मंदिर ने फूस की कुटिया से लेकर नक्काशीदार भव्य मंदिर तक का अद्भुत सफर तय किया है. लगभग 1.20 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह मंदिर श्रद्धा, संघर्ष और सामाजिक सहभागिता की ऐसी कहानी कहता है, जो हर किसी को प्रेरित करती है.
जब ताड़ के पत्तों के बीच शुरू हुआ था मां का दरबार
वर्ष 1962 में गांव के लोगों के पास संसाधनों की भारी कमी थी. इसके बावजूद माता दुर्गा के प्रति उनकी आस्था अटूट थी. ग्रामीणों ने ताड़ के पत्तों से घेरकर एक पंडालनुमा कुटिया बनाई और वहीं मां वैष्णवी दुर्गा की स्थापना की. यही छोटा सा दरबार समय के साथ विशाल धार्मिक केंद्र बन गया.
तीन पीढ़ियों से निभ रही पूजा की परंपरा
मंदिर की आध्यात्मिक विरासत भी उतनी ही समृद्ध है. स्थापना काल में युगल किशोर पांडे पहले पुजारी बने. उनके बाद शालिग्राम पांडे ने पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभाली. वर्तमान में पंडित दिनेश पांडे पूरी निष्ठा के साथ मां की सेवा कर रहे हैं. तीन पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा मंदिर की पहचान बन चुकी है.
एक बीडीओ की पहल और ग्रामीणों का संकल्प
भव्य मंदिर निर्माण का सपना तब आकार लेने लगा जब तत्कालीन बीडीओ मदन प्रसाद सिंह मौवार ने मंदिर की आधारशिला रखी. शिलान्यास पूजा में मुख्य यजमान नाथो शर्मा बने. इसके बाद स्थानीय गणमान्य लोगों ने मंदिर विकास समिति का गठन किया, जिसमें श्रीकांत सिंह, सुदामा सिंह, रामाशीष सिंह, नरेश सिंह, अवध किशोर सिंह, सरयू राम और अर्जुन साव जैसे लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
सवा बीघा जमीन ने बनाया मंदिर को आत्मनिर्भर
मंदिर के पास सवा बीघा कृषि योग्य भूमि है. इस जमीन पर खेती से होने वाली आय को मंदिर के रखरखाव, पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों में खर्च किया जाता है. इसी आत्मनिर्भर मॉडल और जनसहयोग के बल पर आज सवा करोड़ रुपये की लागत वाला भव्य मंदिर खड़ा है.
15 हजार दीपों से जगमगाता है दीपोत्सव
मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यहां आयोजित होने वाला दीपोत्सव है. हर वर्ष दीपावली से एक दिन पहले मंदिर परिसर में 15 हजार से अधिक दीप जलाए जाते हैं. दीपों की रोशनी से पूरा परिसर अलौकिक दिखाई देता है और हजारों श्रद्धालु इस दृश्य के साक्षी बनने पहुंचते हैं.
नवरात्र में उमड़ती है श्रद्धा की बाढ़
शारदीय नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. दूर-दराज के गांवों और शहरों से लोग मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि हलसी की सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक शक्ति का प्रतीक बन चुका है.