गर्भवर्ती प्रियंका को आयरन की गोली देने से हीमोग्लोबिन नहीं बढ़ा. उन्हें एफसीएम (फेरिक कार्बोक्सी माल्टोज) का सिंगल डोज दिया, जिसके बाद उनकी स्थिति में सुधार आने लगा.
लखीसराय के प्रतिनिधि के अनुसार
प्रियंका कुमारी मां बनने वाली थी. डॉक्टरों ने उन्हें आयरन की गोलियां दी थीं, लेकिन विडंबना ही कहें कि उसका शरीर आयरन को पर्याप्त मात्रा में अवशोषित नहीं कर सका. नतीजा यह हुआ कि पहली जांच में 8.3 ग्राम प्रति डेसीलीटर रहा हीमोग्लोबिन कुछ समय बाद बढ़ने के बजाय घटकर 8.1 ग्राम प्रति डेसीलीटर पर पहुंच गया. कमजोरी, चक्कर और बढ़ते जोखिम के बीच वह एक ऐसी गर्भवती महिला बन गयी, जिन्हें तत्काल विशेष चिकित्सकीय सहायता की जरूरत थी.इसी दौरान गांव की आशा कार्यकर्ता किरण कुमारी ने उन्हें प्रसव पूर्व जांच के लिए प्रेरित किया और परिवार की आशंकाओं को दूर किया. चिकित्सकों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्हें एफसीएम (फेरिक कार्बोक्सी माल्टोज) का सिंगल डोज दिया, जिसके बाद उनकी स्थिति में सुधार आने लगा. प्रियंका की यह कहानी बताती है कि सुरक्षित मातृत्व केवल दवाओं का नहीं, बल्कि समय पर पहचान, सही सलाह और भरोसेमंद स्वास्थ्य व्यवस्था का भी परिणाम है. अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पत्रिका द लांसेट हेमेटोलॉजी और विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ अमित कुमार भी सहमति जताते हैं और कहते हैं कि गर्भावस्था के दौरान एनीमिया निम्न और मध्यम आय वाले देशों में मातृ मृत्यु, समयपूर्व प्रसव और कम वजन वाले शिशुओं के जन्म का एक प्रमुख कारण बना हुआ है.
वह कहते हैं कि शोध के अनुसार गंभीर एनीमिया के मामलों में केवल आयरन की गोलियों पर निर्भर रहने के बजाय समय पर दी गई इंटरवेनेस आयरन थेरेपी यानि एफसीएम जैसी इंजेक्शन गर्भवती महिलाओं के हीमोग्लोबिन स्तर में अपेक्षाकृत तेजी से सुधार ला सकती है. यही कारण है कि आज मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों में जोखिम वाली गर्भवतियों की शीघ्र पहचान और त्वरित उपचार को विशेष महत्व दिया जा रहा है.