लखीसराय में सतघरवा कोड़ासी का ऐतिहासिक मेला, जहां सदियों से कायम है आस्था

Aaj Ka Darshan: लखीसराय के सतघरवा कोड़ासी गांव में लगने वाला गुलाब बाबा मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, लोककथाओं और सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत प्रतीक है. यहां झारखंड और बंगाल तक से श्रद्धालु मन्नत लेकर पहुंचते हैं.

चानन (लखीसराय) से रंजन पासवान की रिपोर्ट.

Aaj Ka Darshan: भलुई पंचायत के सतघरवा कोड़ासी गांव के पास स्थित गुलाब बाबा स्थान आज भी लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है. यहां हर साल लगने वाला ऐतिहासिक मेला दूर-दराज के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. ग्रामीणों के अनुसार गुलाब बाबा की पूजा सैकड़ों वर्षों से होती आ रही है. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु बकरा, मुर्गा और सूअर की बलि देकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं.

माघ माह में सजता है आस्था का मेला

ग्रामीण रामटहल कोड़ा और राजेंद्र कोड़ा बताते हैं कि सरस्वती पूजा के बाद माघ महीने में यहां भव्य मेले का आयोजन होता है. सुबह से ही गांव के आसपास मीना बाजार सजने लगता है. मेले में कपड़े, जूते-चप्पल, पूजन सामग्री और खाने-पीने की कई दुकानें लगती हैं. महिलाओं की भीड़ सबसे ज्यादा देखने को मिलती है. खासकर निःसंतान महिलाएं संतान प्राप्ति की मन्नत लेकर बाबा के दरबार में माथा टेकने पहुंचती हैं.

गांव के लोगों के अनुसार गुलाब बाबा स्थान के मुख्य पुजारी भतन कोड़ा हैं. पूजा-पाठ से लेकर मेले की धार्मिक परंपराओं तक सभी व्यवस्थाएं उन्हीं की देखरेख में संपन्न होती हैं. श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से पूजा कर बाबा का आशीर्वाद लेते हैं.

ब्रिटिश दौर की लोककथा आज भी जिंदा

गांव के बुजुर्ग रामटहल कोड़ा अपने दादा से सुनी एक दिलचस्प घटना साझा करते हैं. उनके अनुसार अंग्रेजों के दौर में एक गोरा व्यक्ति घोड़े पर सवार होकर मेले में पहुंचा था. ग्रामीणों ने उसे तिलक लगाकर प्रसाद दिया. बताया जाता है कि उस समय अंग्रेजों ने गांव की गरीबी देखकर लोगों के बीच कपड़े और जूते-चप्पल भी बांटे थे. यह कहानी आज भी गांव में लोककथा की तरह सुनाई जाती है.

नक्सल आंदोलन की कहानी भी चर्चा में

स्थानीय लोगों के बीच एक और घटना काफी चर्चित है. ग्रामीणों के अनुसार एक बार मेले में पुलिस का एक मुखबिर पहुंच गया था. उसी दौरान हथियारों से लैस नक्सली भी वहां पहुंचे, लेकिन मेले की पवित्रता को देखते हुए उन्होंने किसी तरह की हिंसा नहीं की. ग्रामीण इसे गुलाब बाबा की कृपा मानते हैं कि उस दिन एक बड़ी घटना टल गई.

आज भी अटूट है श्रद्धालुओं का विश्वास

सैकड़ों वर्षों पुरानी परंपरा, शांतिपूर्ण आयोजन और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ गुलाब बाबा स्थान को क्षेत्र का बड़ा धार्मिक केंद्र बनाती है. लोगों का मानना है कि बाबा के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता.

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लेखक के बारे में

Published by: Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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