भगवान महावीर के भाई नंदीवर्द्धन ने करवाया था चोरी की गयी प्रतिमा का नर्मिाण

भगवान महावीर के भाई नंदीवर्द्धन ने करवाया था चोरी की गयी प्रतिमा का निर्माण ओम प्रकाशसिकंदरा . जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर की जन्मस्थली के रूप में विख्यात क्षत्रियकुंड लछुआड़ सदियों से जैन धर्मावलंबियों के आस्था का केंद्र रहा है. विश्व को सत्य, अहिंसा, प्रेम तथा करुणा का संदेश देने वाले भगवान महावीर की […]

भगवान महावीर के भाई नंदीवर्द्धन ने करवाया था चोरी की गयी प्रतिमा का निर्माण ओम प्रकाशसिकंदरा . जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर की जन्मस्थली के रूप में विख्यात क्षत्रियकुंड लछुआड़ सदियों से जैन धर्मावलंबियों के आस्था का केंद्र रहा है. विश्व को सत्य, अहिंसा, प्रेम तथा करुणा का संदेश देने वाले भगवान महावीर की जन्मभूमि होने पाने वाली यह शस्य श्यामला धरती अपने अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने की असीम क्षमता रखती है. लगभग 2600 वर्ष पूर्व लछुआड़ से दक्षिण क्षत्रियकुंड राज्य के राजा इक्ष्वाकु वंश के महाराजा सिद्धार्थ थे. महाराजा सिद्धार्थ का विवाह वैशाली के लिच्छवी वंश की राजकुमारी त्रिशला से हुआ था. विवाहोपरांत त्रिशला जब सुसराल आयी तो उनकी सेवा के लिए कुछ लिच्छवी लोग भी साथ आये थे. कालांतर में यही लिच्छवी क्षत्रियकुंड से उत्तर के भूभाग में बस गये. जिस कारण इस स्थान का नाम लिच्छवाड़ पड़ गया. कालांतर में लिच्छवाड़ शब्द ही परिवर्तित होकर लछुआड़ कहलाया. भगवान महावीर के पंच कल्याणक में से तीन जन्म कल्याणक,च्यवण कल्याणक व दीक्षा कल्याणक इसी क्षत्रियकुंड लछुआड़ की धरती पर स्थित है. लगभग 2600 साल पूर्व भगवान महावीर ने सात पहाड़ों व मनोरम वादियों के बीच स्थित इसी क्षत्रियकुंड में अवतरण लेकर समूचे विश्व को सत्य व अहिंसा का संदेश दिया था. भगवान महावीर ने तीस वर्ष की अवस्था में संसारिक मोह का परित्याग करते हुए केवल ज्ञान की प्राप्ति के लिए गृह त्याग कर दिया था. भगवान महावीर के गृह त्याग के 12 वर्ष बाद उनके भाई नंदीवर्द्धन ने भगवान महावीर के ध्यान अवस्था की भारी भरकम प्रतिमा का निर्माण करवा कर उसे राजमहल के एक हिस्से में स्थापित किया था. इन 2600 वर्षों में अनेकों बार राजमहल से लेकर मंदिर तक का स्वरूप परिवर्तित होता रहा. लेकिन भगवान महावीर की यह प्रतिमा जस की तस स्थापित रही. वर्तमान समय में भी जन्मस्थान में पुराने मंदिर को तोड़ कर उसकी जगह नये भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जा रहा था. मंदिर टूटने के बाद भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा के ऊपर तिरपाल लगा दिया था. जहां प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में जैन तीर्थयात्री पहुंच कर भगवान महावीर के चरणधूली को सर माथे पर लगाते थे. लेकिन अपराधियों ने जैन धर्मावलंबियों के आस्था से जुड़े इस अतिप्राचीन प्रतिमा की चोरी कर दुर्गम रास्ते से गुजर कर सात पर्वत मालाओं के बीच स्थित जन्मस्थान आने वाले जैन तीर्थयात्रियों के दिल में कसक व टीस भर दी है.

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