400 वर्षों से हो रहा है लक्ष्मी नारायण की पूजा

400 वर्षों से हो रहा है लक्ष्मी नारायण की पूजा महेश्वरी ही नहीं अपितु इस इलाके के लोगों अगाध श्रद्धा है बाबा लक्ष्मी नारायण परविनय कुमार मिश्रसोनो . प्रखंड के पश्चमी दक्षिणी छोर पर स्थित बड़ी आबादी वाला चर्चित गांव महेश्वरी के पवित्र कलोथर नदी के तट पर अवस्थित बाबा लक्ष्मी नारायण मंदिर का इतिहास […]

400 वर्षों से हो रहा है लक्ष्मी नारायण की पूजा महेश्वरी ही नहीं अपितु इस इलाके के लोगों अगाध श्रद्धा है बाबा लक्ष्मी नारायण परविनय कुमार मिश्रसोनो . प्रखंड के पश्चमी दक्षिणी छोर पर स्थित बड़ी आबादी वाला चर्चित गांव महेश्वरी के पवित्र कलोथर नदी के तट पर अवस्थित बाबा लक्ष्मी नारायण मंदिर का इतिहास काफी पुराना है़ लोगों की अगाध आस्था को अपने में समेटे इस मंदिर में यूं तो प्राय: पूजनोत्सव होते रहते है. परंतु कार्तिक पूर्णिमा पर यहां अहोरात्रि नाम से विशेष पूजनोत्सव होता है़ मंदिर के पुजारी चंद्रकांत पांडेय, जगत पांडेय, मुकेश पांडेय की माने तो यहां लक्ष्मी नारायण की पूजा तकरीबन 400 वर्षों से हो रही है़ बताते हैं कि 400 वर्ष पूर्व इस जंगली इलाके में बसे महेश्वरी स्थित कलोथर नदी के तट पर एक परम तेजस्वी साधु आये थे,जो यहां के पवित्र वातावरण से प्रभावित होकर नदी किनारे ही तपस्या करने लगे. गांव के राम पांडेय व राम सिंह प्रभावित होकर इनकी सेवा करने लगे़ दोनों ग्रामीण भक्त प्राय: यह देख अचंभित हो जाते जब महात्मा नदी में स्नान के दौरान अपनी जटा से एक दिव्य शालिग्राम उतारे. काफी दिनों तक महेश्वरी के इस नदी किनारे तपस्या के बाद जब वे यहां से प्रस्थान करने लगे तब अपने दोनों भक्त सेवक की सेवा से प्रसन्न होकर उनसे कुछ मांगने को कहा़ भक्ति से ओत प्रोत दोनों ग्रामीण ने महात्मा से उनकी जटा में विराजित उसी दिव्य शालिग्राम को मांग लिया़ तब महात्मा ने उन्हें शालिग्राम देते हुए बताया कि ये भगवान लक्ष्मी नारायण है़ इनके लिए मंदिर स्थापित कर इनकी प्रतिदिन विधिवत पूजा करना़ तभी से ग्रामीणों द्वारा उस तपस्वी द्वारा बताये नियम के तहत नदी के तट पर तत्क्षण झोपड़ीनुमा मंदिर बनाकर उनकी पूजा करने लगे. बाद में वहां मिट्टी का मंदिर बनवाया गया़ कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही महात्मा ने शालिग्राम देकर उनकी स्थापना करवाया था. इसलिए इस दिन भगवान की विशेष पूजा किया जाता है. जिसे अहोरात्रि का नाम दिया गया़ सैकड़ों वर्षों के बाद भी पूजा का विधान उसी तरह चलता आ रहा है.

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