ऐतिहासिक बालूबाड़ी काली मंदिर में होती है मन्नतें पूरी

बालूबाड़ी काली मंदिर परिसर महानंदा नदी के बाढ़ से नदी में विलीन होने के बाद मंदिर की पुनः स्थापना की गयी थी

पहाड़कट्टा पोठिया प्रखंड के फाला पंचायत अंतर्गत महानंदा नदी के तट पर अवस्थित बालूबाड़ी काली मंदिर आस्था व विश्वास का प्रतीक है. यहां मां से मांगी गई हर मन्नतें पूरी होती है. मान्यता है कि 153 वर्ष पुरानी मां काली के इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है. बालूबाड़ी में काली पूजा के अवसर पर तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है. इस बार मंगलवार से आरंभ होकर गुरुवार को मेले का समापन होगा. बता दें कि वर्ष 1968 में बालूबाड़ी काली मंदिर परिसर महानंदा नदी के बाढ़ से नदी में विलीन होने के बाद मंदिर की पुनः स्थापना की गयी थी. इस वर्ष ठाकुरगंज निवासी वैद्यनाथ साहा आदि के प्रयास से मंदिर के नाम 10 कटठा जमीन निबंधित केवाला कराया गया है और मंदिर निर्माण का शिलान्यास काली पूजा के पश्चात कराया जायेगा. फाला थावाभीठा गांव के मेला मालिक दीपक कुमार साहा एवं नंदन कुमार साहा ने बताया कि ब्रिटिश हुकूमत के दौरान सन 1872 से दीपावली के दूसरे दिन से शुरू होनेवाला बालुबाड़ी काली मेला लगातार एक माह तक रहता था. इस इलाके के अलावे यहां पश्चिम बंगाल के कलकत्ता,सिलीगुड़ी, कूचबिहार, रायगंज, बागडोगरा से होटल, रेस्टोरेंट, मिठाई, खिलौने की दुकान तथा बच्चों के मनोरंजन के लिए झूला, कठपुतली, सर्कस एवं नृत्य आदि मेला शुरू होने के एक सप्ताह पहले पहुँच जाता था. बताया जाता है कि व्यापारी एक माह के मेले की कमाई से सालभर अपना परिवार का भरण-पोषण कर लेते थे. इसी वजह से व्यापारी तबकों के लोग बालूबाड़ी मेला लगने का बड़े बेसब्री से इन्तेजार में रहते थे. मेला में राजवंशी, आदिवासी समुदाय के लोग दूर-दराज इलाके से पहुँचते थे. मेला में बच्चों से लेकर बुजुर्ग,महिला व पुरुष तक के मनोरंजन के लिए अलग-अलग चीजें हुआ करती थी. लेकिन डेढ़ सौ वर्ष पुरानी मेला का अस्तित्व 1968 में आई भीषण बाढ़ से तहस-नहस हो गया. पक्के के काली मंदिर सहित मेला परिसर का दर्जनों एकड़ भूमि महानंदा नदी के कटाव की भेंट चढ़ गया. फिलहाल यहां पूजा के समय कच्ची बांस का बेरा तथा टीना का छत से मंदिर निर्माण कर पूजा की जाती है. यही कारण है कि फिलहाल महज तीन दिनों के लिए मेला का आयोजन होता है. तीन दिवसीय मेला का आयोजन मेला मालिक नंदन कुमार साहा, अनाधर साहा, दीपक कुमार साहा के सौजन्य से मेला लगाया जाता है. जबकी फिलहाल बिहार के बाहर से महज दस से बारह व्यापारी ही पहुंचते है. इससे पहले लगभग 20 एकड़ जमीन के खुले मैदान में मेला लगाया जाता था. वर्तमान में मेला चार से पांच बीघा के भू-भाग में ही सिमट कर रह गया है. मेला आयोजकों ने फिर से मेला के खोए हुए अस्तित्व को लौटने के प्रयास में जुट गए है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By AWADHESH KUMAR

AWADHESH KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >