किशनगंज जिले के ठाकुरगंज सहित आसपास के चाय उत्पादक क्षेत्रों में बटलिफ (Bought Leaf) फैक्ट्रियों ने भले ही हरी चाय पत्ती की खरीद दोबारा शुरू कर दी हो, लेकिन पिछले दिनों चले गतिरोध के दुष्प्रभाव अब भी बागानों में साफ नजर आ रहे हैं. समय पर खरीद न होने से खेतों में खड़ी फसल अपनी गुणवत्ता खो चुकी है, और अब किसान वही बड़ी व परिपक्व हो चुकी पत्तियां तोड़कर फैक्ट्रियों तक भेजने को मजबूर हैं.
समय पर तुड़ाई न होने से बिगड़ा चक्र
चाय की खेती में समय प्रबंधन का बेहद खास महत्व होता है. कुछ ही दिनों की देरी उत्पादन, गुणवत्ता और बाजार मूल्य तीनों को प्रभावित कर देती है:
- मजबूरी की तुड़ाई: खरीद बंद रहने से जो कोमल पत्तियां बागानों में अटकी रहीं, वे हर गुजरते दिन के साथ बड़ी और कठोर होती चली गईं.
- गुणवत्ता पर असर: चाय उद्योग में 'दो पत्ती और एक कली' को सर्वोत्तम श्रेणी माना जाता है, जिससे बेहतरीन स्वाद, गहरा रंग और सुगंध मिलती है. लेकिन अब पौधों पर पुरानी और बड़ी पत्तियां फैल चुकी हैं, जिन्हें सामान्य दिनों में कभी नहीं तोड़ा जाता.
दोहरी मार झेलने को विवश हैं छोटे चाय उत्पादक
ठाकुरगंज, पोठिया और पूरे किशनगंज जिले के छोटे चाय उत्पादकों (Small Tea Growers) का कहना है कि खरीद संकट के कारण उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है:
किसानों का दर्द: "पहले कई दिनों तक तैयार फसल बागानों में अटकी रही. अब मजबूरी में बड़ी हो चुकी पत्तियों को तोड़ना पड़ रहा है, जिससे गुणवत्ता आधारित बेहतर दाम (Quality Price) मिलने की उम्मीद खत्म हो गई है. चाय की खेती एक सतत चक्र है, जिसका असर अगले कई फ्लश (Flush) तक बना रहेगा."
विशेषज्ञ की राय: सामान्य स्थिति में लौटने में लगेगा समय
चाय विशेषज्ञों के अनुसार, परिपक्व और बड़ी पत्तियों में रेशा (Fiber) अधिक होता है, जिससे बनने वाली चाय की स्वाद और गुणवत्ता प्रभावित होती है.
बिहार का प्रमुख चाय उत्पादक जिला होने के कारण किशनगंज के हजारों परिवार प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हैं. हालांकि खरीद शुरू होने से तात्कालिक राहत मिली है, लेकिन बागानों को फिर से सामान्य उत्पादन चक्र में लौटने और केवल कोमल पत्तियां प्राप्त करने में कुछ समय लगेगा.
