बिहार के सीमांचल अंतर्गत किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड में ऐतिहासिक तैयबपुर रेलवे स्टेशन है. वर्तमान में यह स्टेशन बहुत ज्यादा अनदेखी और बदहाली का शिकार है. कभी कोयला व भाप इंजनों की छुक-छुक आवाज, मुसाफिरों की गहमागहमी और जीवंत व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा यह स्टेशन आज जंगल-झाड़ियों के झुरमुट में तब्दील हो चुका है. स्टेशन परिसर में उगी लंबी-लंबी घास, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और उखड़ा हुआ पहुंच पथ पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR) की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है.
2007 से पहले हर ट्रेन का था ठहराव, अब ठहराव को तरसा स्टेशन
तैयबपुर का रेल इतिहास इस सीमावर्ती अंचल के गौरवशाली अतीत से जुड़ा है. वर्ष 2007 से पहले, यानी छोटी लाइन (मीटर गेज) के दौर में, यहां से गुजरने वाली प्रत्येक पैसेंजर व एक्सप्रेस ट्रेन का ठहराव सुनिश्चित था. स्टेशन के बाहर चाय-नाश्ते की दुकानें, तांगा स्टैंड और स्थानीय व्यापारियों का बाजार गुलजार रहता था.
हालांकि, बड़ी लाइन (आमान परिवर्तन) बनने के बाद न केवल ट्रेनों के ठहराव छीन लिए गए, बल्कि रेलवे ने स्टेशन की भूमिका सीमित कर इसे महज एक उपेक्षित हॉल्ट बना दिया. स्थानीय ग्रामीण लंबे समय से इसे पुन: पूर्ण स्टेशन का दर्जा देने और प्रमुख ट्रेनों के स्टॉपेज बहाल करने की मांग कर रहे हैं.
भाप इंजनों का लाइफलाइन था तैयबपुर: महानंदा से होती थी वाटरिंग
स्टीम लोकोमोटिव के दौर में तैयबपुर की अहमियत जरूरी थी. उस समय कोयले से चलने वाले इंजनों को लंबी दूरी तय करने के लिए पर्याप्त पानी की जरूरत होती थी.
स्टेशन के ठीक पास से बहने वाली पवित्र महानंदा नदी के कारण तैयबपुर में इंजनों में पानी भरने (वाटरिंग सिस्टम) का बड़ा ढांचा विकसित था. ट्रेनें यहां रुकती थीं, चालक दल पानी भरते थे और मुसाफिरों से पूरा प्लेटफॉर्म आबाद रहता था. कभी-कभी, जब इंजन को पानी भरने के लिए रोका जाता था, तो पूरा प्लेटफार्म यात्रियों की भीड़ से खचाखच भर जाता था. बच्चे इधर-उधर दौड़ते-भागते थे और चाय वाले अपनी गरमागरम चाय बेचते थे. आज वह ऐतिहासिक पहचान पूरी तरह मिटने की कगार पर है.
अधिकारियों ने खिंचवाईं तस्वीरें, फिर भूल गए वादे
स्थानीय निवासी केशव यादव, मदन पांडे, गौतम यादव आदि ने आक्रोश जताते हुए बताया कि करीब एक माह पूर्व रेल मंडल से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी कर्मचारियों के लाव-लश्कर के साथ तैयबपुर स्टेशन पहुंचे थे.
अधिकारियों ने स्टेशन के कोने-कोने का मुआयना किया, फाइलों पर नोट बनाए और कर्मियों के साथ ग्रुप फोटो खिंचवाकर लौट गए. अधिकारियों के जाने के बाद, ग्रामीणों को उम्मीद थी कि कम से कम साफ-सफाई और मरम्मत का काम शुरू होगा, लेकिन उनकी उम्मीदें उस समय टूट गईं जब उन्होंने देखा कि स्टेशन तक पहुंचने का रास्ता अभी भी खतरनाक बना हुआ है. आज तक एक भी सफाईकर्मी झाड़ियों को हटाने नहीं पहुंचा.
जर्जर पहुंच पथ बना राहगीरों के लिए मुसीबत
स्टेशन तक पहुंचने वाली संपर्क सड़क की स्थिति बेहद नारकीय है. सड़क पूरी तरह उखड़ी हुई है, नुकीली गिट्टियां बिखरी हैं और दोनों तरफ कंटीली झाड़ियों का कब्जा है.
शाम ढलते ही रोशनी के अभाव में लोग इस रास्ते से गुजरने से कतराते हैं. स्थानीय नागरिकों की रेल प्रशासन से कई मांगें हैं, जिनमें प्रमुख हैं:
- परिसर की तत्काल सफाई कराई जाए.
- पहुंच पथ का पक्कीकरण किया जाए.
- रोशनी की व्यवस्था बहाल की जाए.
- पेयजल की व्यवस्था बहाल की जाए.
- इस ऐतिहासिक स्टेशन की गरिमा को पुनर्जीवित किया जाए.
