किशनगंज जिले में विधानसभा का चुनाव 11 नवंबर को होगा.14 नवंबर को मतगणना में यह तय होगा कि जीत किसकी हुई और किसको जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना. इससे पहले झूठ-सच का सहारा लेकर सोशल साइट पर जारी जंग न सिर्फ रोचक है,बल्कि नेताओं की मुश्किल को बढ़ाने वाला है. फिलहाल जारी फेसबुकिया और सोशल मिडिया जंग ऐसे शुरू हुआ है,जैसे सबको इस मौके का इंतजार था. कल तक नेताजी के समर्थन में रहनेवाले समर्थक भी चुनाव की दुंदुभी बजते ही विरोध का राग अलापने लगे हैं. कोई इस चुनाव को विकास के मुद्दे से जोड़ रहा है तो कोई हवा-हवाई बनाम जमीनी नेता का नारा देने लगा है. पिछले चुनाव में किए गए वायदे की याद दिलाकर वोटरों को साधने का प्रयास किया जा रहा है,तो क्षेत्रों की समस्याओं की याद फेसबुक पर ताजा हो रही है. कोई फेसबुक पर ही पार्टी के प्रत्याशी को जितवा रहा है. समर्थन और विरोध का जंग बहुत विश्वसनीय भले न हो,लेकिन कुछ देर के लिए भ्रम फैलाने में कामयाब हो जा रहा है. विरोध और समर्थन के अपने-अपने तर्क हैं. विरोधी और समर्थक अपने अपने समर्थन में लाइक,कमेंट और शेयर की संख्या बढ़ाने के लिए फोन का सहारा ले रहे हैं. साथियों को फोन कर अपना पोस्ट पढ़ने को बोल रहे हैं. युवा नेताओं की इस फितरत से बड़े नेता और कार्यकर्ता मुश्किल में पड़े हैं. कहीं बात बिगड़ न जाए. इस पर पैनी नजर रख रहे हैं. उधर,चुनाव मैदान में उतर रहे नेताजी की परेशानी अलग बढ़ी है. विरोधी के सवालों के जवाब और चुनावी पैंतरे से पहले अपने ही लोगों को मनाने में मशक्कत करनी पड़ रही है. कारण, फेसबुकिया जंग कहीं भविष्य के लिए खतरा न बन जाए. इससे परेशान नेताजी फेसबुक पर दौड़ रहे सवालों के जवाब के लिए चहेते लोगों को अलग जिम्मेदारी देने की तैयारी में बताए जाते हैं.
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