ठाकुरगंज (किशनगंज). सरकारी विद्यालयों में संचालित पीएम पोषण योजना की व्यवस्था को लेकर शिक्षक समुदाय में बदलाव की मांग जोर पकड़ने लगी है. शिक्षकों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में प्रधानाध्यापकों को भोजन की खरीद, रसोई संचालन, भुगतान, हिसाब-किताब और गुणवत्ता की निगरानी जैसी कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं. वहीं मई 2026 से परिवर्तन राशि के भुगतान में देरी के कारण विद्यालयों में भोजन व्यवस्था संचालित करने में अतिरिक्त कठिनाइयां सामने आ रही हैं.
राशि भुगतान में देरी से बढ़ी परेशानी
वर्तमान व्यवस्था में विद्यालय शिक्षा समिति की निगरानी में प्रधानाध्यापक बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था सुनिश्चित कराते हैं. इसके लिए खाद्य सामग्री की खरीद, रसोई संचालन, भुगतान और लेखा-जोखा सहित कई काम विद्यालय स्तर पर किए जाते हैं. शिक्षकों का कहना है कि राशि समय पर उपलब्ध नहीं होने पर भोजन व्यवस्था को नियमित बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मिले राहत
शिक्षकों का कहना है कि उनका मूल दायित्व बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना और विद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों को बेहतर बनाना है. भोजन व्यवस्था से जुड़े दैनिक कार्यों में समय और ऊर्जा खर्च होने से शिक्षण कार्य प्रभावित होने की आशंका रहती है. ऐसे में पीएम पोषण योजना के संचालन की जिम्मेदारी के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए.
जीविका दीदियों को दी जा सकती है जिम्मेदारी
शिक्षक समुदाय का सुझाव है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय जीविका समूहों अथवा जीविका दीदियों को विद्यालयों में पीएम पोषण योजना के तहत भोजन निर्माण और वितरण की जिम्मेदारी दी जा सकती है. स्थानीय महिला समूह निर्धारित मेन्यू के अनुसार भोजन तैयार कर समय पर बच्चों को उपलब्ध करा सकते हैं. इस व्यवस्था से शिक्षकों को भोजन प्रबंधन के दैनिक कार्यों से राहत मिलने के साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और अतिरिक्त आय का अवसर भी पैदा हो सकता है.
विद्यालय शिक्षा समिति के पास रहे निगरानी की जिम्मेदारी
प्रस्तावित व्यवस्था में भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, मात्रा, निर्धारित मेन्यू और समय पर वितरण की निगरानी विद्यालय शिक्षा समिति के पास रखी जा सकती है. प्रधानाध्यापक योजना की निगरानी और समन्वय में भूमिका निभाएं, लेकिन भोजन पकाने और रोजमर्रा की रसोई व्यवस्था की प्रत्यक्ष जिम्मेदारी से उन्हें मुक्त किया जा सकता है.
स्पष्ट एसओपी बनाने की जरूरत
शिक्षकों का कहना है कि यदि सरकार इस मॉडल पर विचार करती है तो इसके लिए स्पष्ट एसओपी तैयार करना जरूरी होगा. इसमें भोजन की गुणवत्ता, मेन्यू, स्वच्छता, महिला समूहों की जिम्मेदारी, भुगतान प्रक्रिया और शिकायत निवारण की व्यवस्था स्पष्ट की जा सकती है. साथ ही जीविका समूहों को योजना की राशि समय पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी.
पायलट प्रोजेक्ट से शुरू करने का सुझाव
शिक्षक समुदाय का सुझाव है कि पहले कुछ चयनित ग्रामीण विद्यालयों में इस व्यवस्था को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जाए. भोजन की गुणवत्ता, समयबद्धता, खर्च, बच्चों की संतुष्टि और महिला समूहों के कामकाज का मूल्यांकन करने के बाद सफल मॉडल को अन्य विद्यालयों में लागू किया जा सकता है.
शिक्षा और महिला सशक्तीकरण से जुड़ सकती है योजना
प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि इससे बच्चों को समय पर पौष्टिक भोजन, शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से राहत और ग्रामीण महिलाओं को रोजगार का अवसर मिल सकता है. इस तरह पीएम पोषण योजना को शिक्षा व्यवस्था के साथ महिला सशक्तीकरण से जोड़कर अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है.
