किशनगंज. भारतीय संस्कृति में माता-पिता और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है. सनातन धार्मिक परंपरा में पितृपक्ष को इसी भाव को समर्पित विशेष अवधि माना जाता है. इस दौरान लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य पूर्वजों का स्मरण करते हुए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान और दान-पुण्य करते हैं. पुरोहितों के अनुसार पितृपक्ष में श्रद्धा और विधि-विधान के साथ किए जाने वाले कर्मों का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है.
माता-पिता को माना गया है जीवन का आधार
भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में माता-पिता को संतान के जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया गया है. भगवान गणेश से जुड़ी प्रसिद्ध कथा में भी माता-पिता को संसार का केंद्र माना गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश जी ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा कर यह संदेश दिया कि संतान के लिए माता-पिता का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है.
इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए भारतीय समाज में अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा विकसित हुई, जिसे पितृपक्ष के दौरान विशेष रूप से निभाया जाता है.
26 सितंबर से शुरू होगा पितृपक्ष
इस वर्ष पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा. धार्मिक परंपरा के अनुसार इस अवधि में पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है. परिवार अपने दिवंगत पूर्वजों की स्मृति में धार्मिक अनुष्ठान करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं.
पितृपक्ष को आम तौर पर पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की अवधि के रूप में देखा जाता है.
तर्पण और श्राद्ध का बताया गया धार्मिक महत्व
पुरोहित घनश्याम झा के अनुसार धार्मिक ग्रंथों में श्राद्ध कर्म के माध्यम से पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की मान्यता है. उन्होंने गरुड़ पुराण में वर्णित श्लोक का उल्लेख करते हुए बताया कि श्राद्ध कर्म से संतुष्ट होकर पितर आयु, संतान, यश, कीर्ति, बल, धन और धान्य की वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. उन्होंने बताया कि पितृपक्ष के दौरान श्रद्धा के साथ किए गए तर्पण और श्राद्ध कर्म का उद्देश्य अपने पूर्वजों का स्मरण करना और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना है.
दान-पुण्य की भी है परंपरा
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध और तर्पण के साथ दान-पुण्य करने की भी परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और अन्य उपयोगी सामग्री का दान करने से पुण्य प्राप्त होता है. कई परिवार अपने पूर्वजों की स्मृति में ब्राह्मण भोज, अन्नदान और अन्य धार्मिक गतिविधियां भी करते हैं. अलग-अलग क्षेत्रों में पितृपक्ष से जुड़ी परंपराओं और अनुष्ठानों में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है.
पितृपक्ष में 16 दिनों तक चलते हैं श्राद्ध कर्म
धार्मिक पंचांग की परंपरा के अनुसार पितृपक्ष में विभिन्न तिथियों पर पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है. जिन लोगों के निधन की तिथि ज्ञात होती है, उनके लिए उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है. सर्वपितृ अमावस्या को भी विशेष महत्व दिया जाता है और इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाया हो.
पितृ दोष को लेकर भी हैं धार्मिक मान्यताएं
पुरोहित सरोज झा बताते हैं कि हिंदू धार्मिक परंपरा में पितृ दोष की भी मान्यता है. धार्मिक विश्वास के अनुसार पूर्वजों के प्रति उचित कर्म नहीं किए जाने से परिवार के जीवन में बाधाएं आने की धारणा है. इसी कारण पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य कर पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करने की परंपरा है. हालांकि पितृ दोष और उससे जुड़े प्रभाव धार्मिक मान्यताओं का विषय हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाता.
पूर्वजों को याद करने का अवसर है पितृपक्ष
पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार और समाज में पूर्वजों की स्मृतियों को जीवित रखने का अवसर भी माना जाता है. इस दौरान नई पीढ़ी को अपने परिवार की परंपरा, पूर्वजों के योगदान और उनके प्रति सम्मान की भावना से परिचित कराने की परंपरा रही है.
श्रद्धा के साथ कर्म करने की परंपरा
पितृपक्ष में तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्मों का धार्मिक महत्व बताया गया है. परिवार अपनी परंपरा और स्थानीय रीति-रिवाज के अनुसार इन अनुष्ठानों को संपन्न करते हैं. पुरोहितों का कहना है कि पितृपक्ष का मूल भाव अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है.
