Paryushan Parv Swadhyay Diwas: किशनगंज पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व-2026 के दूसरे दिन किशनगंज तेरापंथ समाज की ओर से स्वाध्याय दिवस श्रद्धा और आध्यात्मिक भावनाओं के साथ मनाया गया. कार्यक्रम में उपासक महावीर दुगड़ एवं झब्बर दुगड़ का सानिध्य रहा. बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं के साथ विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारी और सदस्य कार्यक्रम में शामिल हुए.
इस अवसर पर स्वाध्याय को केवल धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन तक सीमित नहीं बताया गया, बल्कि इसे स्वयं के भीतर झांकने और अपने वास्तविक स्वरूप को समझने की साधना के रूप में समझाया गया. प्रवचन में उपासक महावीर दुगड़ ने कहा कि दुनिया को जानने के लिए बाहरी ज्ञान जरूरी है, लेकिन जीवन को सही दिशा देने के लिए व्यक्ति का स्वयं को जानना भी उतना ही आवश्यक है.
स्वाध्याय से अपने कर्म और जीवन का बोध
उपासक महावीर दुगड़ ने कहा कि स्वाध्याय केवल पुस्तकों को पढ़ने का नाम नहीं है. यह अपने भीतर झांकने की प्रक्रिया है. आगमों में निहित तीर्थंकर वाणी के अध्ययन से व्यक्ति को हेय, ज्ञेय और उपादेय का बोध होता है.
उन्होंने कहा कि स्वाध्याय के माध्यम से व्यक्ति अपने कर्मों, वास्तविक स्वरूप और जीवन के उद्देश्य को समझने की दिशा में आगे बढ़ता है. ज्ञान केवल जानकारी हासिल करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उसका प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार और जीवनशैली में भी दिखाई देना चाहिए.
ज्ञान तभी सार्थक, जब व्यवहार में उतरे
प्रवचन में कहा गया कि जैन दर्शन में स्वाध्याय को कर्म निर्जरा का महत्वपूर्ण साधन माना गया है. ज्ञान अर्जित करना, उसे दूसरों तक पहुंचाना और बार-बार उसका वाचन एवं मनन करना स्वाध्याय की प्रक्रिया का हिस्सा है.
महावीर दुगड़ ने कहा कि ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब वह व्यवहार में दिखाई दे. व्यक्ति के जीवन में संयम, विवेक, विनय और आत्मजागृति विकसित हो, तभी अध्ययन का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है.
उन्होंने श्रावक-श्राविकाओं को नियमित स्वाध्याय को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी. उनका संदेश था कि धार्मिक साहित्य का अध्ययन केवल पर्व या किसी विशेष अवसर तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे दैनिक जीवन में स्थान मिलना चाहिए.
2026 को योगक्षेम वर्ष के रूप में मनाया जा रहा
तेरापंथ धर्मसंघ में इस वर्ष स्वाध्याय दिवस का विशेष महत्व बताया गया. आचार्य महाश्रमण की प्रेरणा से वर्ष 2026 को योगक्षेम वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है. इसका उद्देश्य पूर्व अर्जित ज्ञान-संपदा का संरक्षण करने के साथ वर्तमान चतुर्विध धर्मसंघ में ज्ञान का विकास करना है.
इसी क्रम में स्वाध्याय दिवस के अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं ने आगम, तत्त्वज्ञान और जैन साहित्य का अध्ययन किया. उपासक द्वय ने नियमित स्वाध्याय के महत्व को समझाते हुए इसे जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया.
Paryushan Parv Swadhyay Diwas: बाहरी दुनिया से पहले खुद को जानना जरूरी
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि व्यक्ति के लिए स्वयं को जानना आध्यात्मिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. बाहरी ज्ञान व्यक्ति को दुनिया, समाज और परिस्थितियों से परिचित कराता है, जबकि स्वाध्याय उसे उसके आत्मस्वरूप से परिचित कराने का माध्यम बनता है.
पर्युषण महापर्व के दौरान आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक साधना पर जोर दिया जाता है. ऐसे में स्वाध्याय दिवस का आयोजन श्रद्धालुओं के लिए अपने भीतर झांकने और जीवन में ज्ञान के वास्तविक उपयोग पर विचार करने का अवसर बना. कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि ग्रंथों का अध्ययन तभी सार्थक है, जब उससे व्यक्ति के विचार, व्यवहार और जीवन में सकारात्मक बदलाव दिखाई दे.
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