ठाकुरगंज (किशनगंज) : किशनगंज से सियालदह की करीब 457 किलोमीटर की रेल यात्रा में अलग-अलग ट्रेनों के निर्धारित समय में घंटों का अंतर यात्रियों के लिए सवाल खड़ा कर रहा है. एक ओर वंदे भारत इस दूरी को करीब 6 घंटे 42 मिनट में तय करती है, वहीं कंचनकन्या एक्सप्रेस को करीब 10 घंटे 15 मिनट लगते हैं. दोनों के बीच करीब 3 घंटे 33 मिनट का अंतर है.
सवाल यह नहीं है कि हर ट्रेन वंदे भारत की रफ्तार से चले. असली सवाल यह है कि एक ही रेलमार्ग पर ट्रेनों के यात्रा समय में इतना बड़ा अंतर आखिर किन वजहों से है.
किशनगंज-मालदा के 148 किमी में 2 घंटे से ज्यादा का फर्क
किशनगंज से मालदा टाउन की दूरी करीब 147-148 किलोमीटर है. इस हिस्से में वंदे भारत को करीब 1 घंटे 57 मिनट, जबकि शताब्दी को 2 घंटे 5 मिनट लगते हैं. वहीं दार्जिलिंग मेल करीब 2 घंटे 40 मिनट, पदातिक और कंचनकन्या करीब 2 घंटे 55 मिनट तथा तीस्ता-तोरसा करीब 3 घंटे 18 मिनट लेती है.
कामाख्या-पुरी एक्सप्रेस को इसी दूरी के लिए करीब 4 घंटे 8 मिनट निर्धारित हैं. यानी सबसे तेज और सबसे धीमी ट्रेन के बीच करीब 2 घंटे 11 मिनट का अंतर है.
यह अंतर केवल अधिकतम गति से नहीं समझाया जा सकता. इसमें ट्रेन के ठहराव, सिग्नलिंग, लाइन क्षमता, क्रॉसिंग, तेज ट्रेनों की प्राथमिकता और अन्य परिचालन कारण भूमिका निभा सकते हैं.
मालदा के बाद भी बदलती है तस्वीर
दार्जिलिंग मेल के टाइमटेबल पर नजर डालें तो किशनगंज से रात 8:40 बजे चलकर ट्रेन रात 11:20 बजे मालदा पहुंचती है. यानी करीब 148 किलोमीटर में 2 घंटे 40 मिनट.
इसके बाद मालदा से रात 11:30 बजे रवाना होकर ट्रेन रात 1:54 बजे बोलपुर पहुंचती है. बोलपुर से बर्दवान की करीब 52 किलोमीटर दूरी तय करने में करीब 49 मिनट का समय निर्धारित है. इसके बाद बर्दवान से सियालदह की करीब 102 किलोमीटर दूरी के लिए लगभग 2 घंटे 47 मिनट निर्धारित हैं.
यहीं यात्रियों के लिए बड़ा सवाल उठता है कि करीब 100 किलोमीटर की दूरी के लिए इतना अधिक समय किन कारणों से लगता है.
कंचनकन्या का टाइमटेबल भी खड़े करता है सवाल
13150 कंचनकन्या एक्सप्रेस किशनगंज से रात 10:05 बजे चलकर मालदा टाउन करीब 1:00 बजे पहुंचती है. करीब 147 किलोमीटर के इस हिस्से में 2 घंटे 55 मिनट निर्धारित हैं.
मालदा से आगे ट्रेन करीब 185 किलोमीटर की दूरी 3 घंटे 5 मिनट में तय कर बोलपुर पहुंचती है. बोलपुर से बर्दवान की करीब 52 किलोमीटर दूरी के लिए लगभग 1 घंटा 6 मिनट, जबकि बर्दवान से सियालदह की करीब 101 किलोमीटर दूरी के लिए 2 घंटे 52 मिनट निर्धारित हैं.
इससे साफ है कि सवाल केवल किशनगंज-मालदा के हिस्से का नहीं है. पूरे रूट में अलग-अलग हिस्सों के लिए निर्धारित समय में बड़ा अंतर दिखाई देता है.
ट्रेन धीमी है या परिचालन व्यवस्था?
रेलवे के लिए यह अंतर सिर्फ टाइमटेबल का मामला नहीं होना चाहिए. यह देखना जरूरी है कि अतिरिक्त समय कहां खर्च हो रहा है.
क्या ट्रेन को बार-बार सिग्नल पर रोका जाता है? क्या तेज ट्रेनों को प्राथमिकता देने से दूसरी ट्रेनों को इंतजार करना पड़ता है? क्या कुछ हिस्सों में ट्रैक की क्षमता ट्रेनों की संख्या के मुकाबले कम है? क्या लंबे या अनावश्यक ठहराव को कम किया जा सकता है?
इन सवालों का सटीक जवाब रेलवे के परिचालन आंकड़ों से ही सामने आ सकता है.
सुरक्षा के साथ कम हो यात्रियों का सफर समय
रेलवे में सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और केवल यात्रा समय कम करने के लिए सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता. लेकिन उपलब्ध ट्रैक, सिग्नलिंग और परिचालन व्यवस्था का अधिकतम कुशल इस्तेमाल भी जरूरी है.
किशनगंज से सियालदह के बीच अलग-अलग ट्रेनों के निर्धारित समय का अंतर यही सवाल उठाता है कि क्या बेहतर ट्रैक, सिग्नलिंग और परिचालन व्यवस्था से यात्रियों का ‘लूज टाइम’ कम किया जा सकता है?
क्योंकि यात्री के लिए रेलवे की गुणवत्ता सिर्फ ट्रेन की अधिकतम रफ्तार से तय नहीं होती. असली सवाल यह है कि 457 किलोमीटर के सफर में उसका कितना समय बचाया जा सकता है.
