सीमांचल के किशनगंज जिले अंतर्गत भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्र दिघलबैंक स्थित संजय गांधी मैदान में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर सदियों पुरानी लोक परंपरा 'नारियल खेल' का भव्य एवं रोमांचक आयोजन किया गया. इस पारंपरिक लोक खेल और सांस्कृतिक उत्सव को देखने के लिए आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों की संख्या में ग्रामीण और युवा मैदान में जुटे, जिससे पूरा इलाका उत्सव के रंग में सराबोर हो गया. खेल में युवाओं ने अपने अदम्य साहस, शारीरिक संतुलन और ताकत का बेमिसाल प्रदर्शन किया. वहीं दूसरी ओर, भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के अलौकिक बाल रूप में सजे नन्हे-मुन्ने बच्चों ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाकर भक्तिमय समां बांध दिया.
घी-सिंदूर से चिकने बांस पर चढ़ने की अग्निपरीक्षा
नारियल खेल के रोमांचक नियमों और युवाओं के हैरतअंगेज करतबों ने दर्शकों की सांसें थाम दीं:
- कठिन चुनौती: मैदान के बीचों-बीच एक विशाल बांस गाड़ा गया था, जिसे अत्यधिक फिसलन भरा बनाने के लिए पारंपरिक तरीके से शुद्ध घी और सिंदूर का गाढ़ा लेप लगाया गया था.
- कलश और नारियल उतारने की होड़: बांस के सबसे ऊपरी छोर पर एक पवित्र कलश व नारियल स्थापित किया गया था. प्रतिभागियों को लगातार फिसलते हुए एक-दूसरे का सहारा लेकर या व्यक्तिगत बाहुबल से शीर्ष पर पहुंचकर उसे उतारना था.
- जयकारों से गूंजा मैदान: जब भी कोई युवा बांस के मध्य हिस्से तक पहुंचकर नीचे फिसलता, दर्शक दीर्घा से 'जय कन्हैया लाल की' के जयकारे और तालियों की गड़गड़ाहट उसका हौसला दोगुनी ऊर्जा से बढ़ा देती.
आयोजन का संक्षिप्त विवरण
| प्रमुख पहलू (Key Highlights) | विवरण / तथ्य (Details) |
| आयोजन स्थल | संजय गांधी मैदान, दिघलबैंक (किशनगंज) |
| पारंपरिक खेल | नारियल खेल (घी-सिंदूर लेपित बांस पर चढ़ने की लोक स्पर्धा) |
| अवसर | श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महापर्व |
| मुख्य आयोजक / संरक्षक | गणेश कुमार सिंह (मुखिया प्रतिनिधि) |
| सांस्कृतिक आकर्षण | बाल स्वरूप में राधा-कृष्ण फैंसी ड्रेस झांकी, पारंपरिक लोक संगीत |
| प्रमुख सहयोगी | रमेश महतो, मनिया कामती, अवधेश राय, गजेंद्र कमती, सोनदेव, दीपक कमती, धनी कामती, पप्पू शर्मा, करण साहनी, पंकज ठाकुर, किशन ठाकुर आदि |
नन्हे राधा-कृष्ण बने आकर्षण का केंद्र
उत्सव के दौरान नन्हे बच्चों की वेशभूषा ने सभी का दिल जीत लिया:
- मनमोहक रूप: मोर मुकुट, पीतांबरी वस्त्र और बांसुरी थामे नन्हे कान्हा और पारंपरिक लहंगे में सजी राधा रानी की बाल छवियां मैदान में आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहीं.
- तस्वीरें खिंचाने की होड़: आयोजन में पहुंचे ग्रामीणों और परिजनों ने इन बच्चों के साथ सेल्फी और तस्वीरें खिंचवाईं. धार्मिक आस्था और ग्रामीण लोक संस्कृति का यह अद्भुत मेल देखते ही बन रहा था.
मुखिया प्रतिनिधि गणेश सिंह बोले: 'लोक परंपराएं ही हैं सामाजिक एकता की नींव'
आयोजन की संपूर्ण व्यवस्था की निगरानी कर रहे मुखिया प्रतिनिधि गणेश कुमार सिंह ने जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा:
- संस्कृति का संरक्षण: जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह हमारे लोक जीवन, पारंपरिक खेलों और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करने का सशक्त माध्यम है.
- भाईचारे का संदेश: नारियल खेल जैसे सामूहिक आयोजन युवाओं को शारीरिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ समाज में आपसी प्रेम, सहयोग और एकजुटता का भाव भरते हैं. आधुनिक दौर में डिजिटल गैजेट्स से हटकर युवा पीढ़ी को इन पारंपरिक धरोहरों से जोड़े रखना समय की मांग है.
