होली से शुरू हुआ गणगौर महापर्व का धूमधाम से हुआ संपन्न
आस्था, परंपरा व सांस्कृतिक उत्साह का प्रतीक गणगौर महापर्व शनिवार को पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हो गया
By AWADHESH KUMAR | Updated at :
ठाकुरगंज
आस्था, परंपरा व सांस्कृतिक उत्साह का प्रतीक गणगौर महापर्व शनिवार को पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हो गया. मारवाड़ी समाज की महिलाओं ने राजस्थानी रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना कर गणगौर माता की प्रतिमा का भव्य विसर्जन किया. शहर के विभिन्न मोहल्लों से बड़ी संख्या में महिलाएं महानंदा नदी तट पर एकत्रित हुई. इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं ने नृत्य-गीत के साथ उत्सव को जीवंत बना दिया. ढोल-नगाड़ों और मंगल गीतों के बीच गणगौर एवं जवारा का विधिवत विसर्जन किया गया. विसर्जन के मौके पर महिलाओं ने एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर खुशियां साझा की. पूरे क्षेत्र में भक्ति और उल्लास का अनोखा संगम देखने को मिला.
सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक पर्व
गणगौर पूजा महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखती है. विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए यह पूजा करती हैं.
16 दिनों तक चलता है पूजन
होली से प्रारंभ होकर यह पर्व 16 दिनों तक चलता है और चैत्र शुक्ल तृतीया को इसका समापन होता है. इस दौरान महिलाएं प्रतिदिन श्रद्धा और भक्ति के साथ गणगौर माता की पूजा करती हैं.
पूजा की पारंपरिक विधि
पूजा में साफ पटरा, कलश, काली मिट्टी, होलिका की राख, उपले तथा सुहाग की सामग्री मेहंदी, बिंदी, सिंदूर, काजल, इत्र और शुद्ध घी का विशेष महत्व होता है. महिलाएं व्रत रखकर शिव-पार्वती को वस्त्र अर्पित करती हैं और चंदन, अक्षत, धूप, दीप, दूब व पुष्प से पूजन करती हैं. गणगौर माता को फल, पूड़ी और गेहूं का भोग लगाया जाता है.
लोकमान्यता और परंपरा
मान्यता है कि जहां गणगौर की स्थापना होती है, वह स्थान माता गौरी का मायका और जहां विसर्जन होता है, वह उनका ससुराल माना जाता है. शाम के शुभ मुहूर्त में माता को जल अर्पित कर तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है.