किशनगंज जिले के पौआखाली क्षेत्र में सावन का महीना होने के बावजूद बारिश न होने से किसानों के सामने गंभीर जल संकट खड़ा हो गया है. क्षेत्र की जीवनदायिनी कही जाने वाली बूढ़ी कनकई नदी में इस समय पानी का स्तर बेहद कम हो गया है. बारिश के अभाव और तेज धूप के कारण खेतों की नमी तेजी से सूख रही है, जिससे धान की फसल और बिचड़ों (पौध) को बचाना किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है.
प्राकृतिक जलस्रोत सूखा, बढ़ा आर्थिक बोझ
बूढ़ी कनकई नदी आसपास के सैकड़ों बीघा खेतों की सिंचाई के लिए मुख्य प्राकृतिक जरिया रही है. नदी में पर्याप्त पानी होने पर किसान आसानी से कम लागत में खरीफ फसलों की सिंचाई कर लेते थे.
अब नदी के सूखने जैसी स्थिति बनने से छोटे और मझौले किसानों को मजबूरन डीजल पंप और बिजली मोटर का सहारा लेना पड़ रहा है. इससे खेती की लागत (Production Cost) काफी बढ़ रही है, जिससे पहले से ही आर्थिक तंगी झेल रहे किसानों की चिंताएं दोगुनी हो गई हैं.
सावन में नदी का सूखना बना चिंता का विषय
खेती-किसानी के लिहाज से सावन के महीने को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. अमूमन इस दौरान नदियां उफान पर होती हैं, लेकिन इस बार सावन में ही बूढ़ी कनकई नदी का जलस्तर गिरना क्षेत्र के पारिस्थितिक और जल हालात पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर रहा है.
तेज धूप के कारण धान के बिचड़े झुलसने की कगार पर पहुंच गए हैं, जिससे किसान दिन-रात आसमान की ओर टकटकी लगाए बारिश की राह देख रहे हैं.
पिछले हफ्तों के रिकॉर्ड से अब भी बंपर पैदावार की उम्मीद
हालांकि, एक राहत की बात यह भी है कि पिछले कुछ हफ्तों के दौरान जिले में दर्ज की गई औसतन बारिश के आंकड़ों को देखते हुए कृषि विभाग, जिला प्रशासन और किसानों को इस साल धान की बंपर पैदावार होने की पूरी उम्मीद है.
किसान आशा लगाए बैठे हैं कि आने वाले दिनों में मानसून फिर से जोर पकड़ेगा, जिससे बूढ़ी कनकई नदी में जलस्तर बहाल होगा और खरीफ की फसल को संजीवनी मिलेगी.
