दिघलबैंक : साक्षात प्रकृति की आराधना का चार दिवसीय अनुष्ठान छठ पूजा की शुरुआत आज शुक्रवार को नहाय-खाय साथ ही प्रारंभ हो जायेगा, जिसको लेकर तैयारियां अंतिम चरण में है. कार्तिक माह में मनाये जाने वाला लोक आस्था के महापर्व छठ का हिदू धर्म में एक विशेष और अलग स्थान है.
कहा जाता है कि इस पर्व में प्रकृति की साक्षात पूजा होती है. शुद्धता एवं पवित्रता इस पर्व का मुख्य अंग है, प्रकृति के अवयवों में से एक जल स्रोतों के निकट छठ पूजा का आयोजन होता है. व्रती द्वारा पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ दिये जाते हैं. इसी क्रम में उल्लेखनीय है कि संभवतः ये अपने आप में ऐसा पहला पर्व है जिसमें कि डूबते और उगते दोनों ही सूर्यों को अर्घ दिया जाता है, उनकी वंदना की जाती है. सांझ-सुबह की इन दोनों अर्घों के पीछे हमारे समाज में एक आस्था काम करती है. वो आस्था ये है कि सूर्यदेव की दो पत्नियां हैं- ऊषा और प्रत्यूषा, सूर्य के भोर की किरण ऊषा होती है
और सांझ की प्रत्यूषा, अतः सांझ-सुबह दोनों समय अर्घ देने का उद्देश्य सूर्य की इन दोनों पत्नियों की अर्चना-वंदना होती है और दिखावा और आडंबर से अलग हट कर इस पर्व का आयोजन ही इसका विशेष पक्ष है. 48 घंटे के लंबे उपवास के दौरान पानी में खड़ा होकर सूर्य देवता की अाराधना की जाती है अस्ताचलगामी (डूबते) सूर्य को और उदीयमान (उगते)सूर्य को अर्घ देने के उपरांत ही इस महा अनुष्ठान का समापन होता है. आधुनिकता से अलग छठ पर्व में मिट्टी और कृषि उत्पादनों का शुरू से लेकर अंत तक इस्तेमाल होता है,
मिट्टी के चूल्हों पर खरना का प्रसाद तथा पकवान, बांस से निर्मित डाला को सजा कर ही छठव्रती अपने परिवार के साथ घाटों की और प्रस्थान करते है. पूजा सामग्री में पानी सिंघाड़ा, ईख, हल्दी, नारियल, नींबू के अलावे मौसमी फलों और गाय के दूध की अनिवार्यता होती है. बदलते समय और आधुनिकता से छठ पर्व पर कोई असर नहीं हुआ है. घर से बाहर नदी और तालाबों के निकट मनाये जाने से एक सामाजिक वातावरण का माहौल भी स्थापित होता है. छठ के मौके पर प्रदेश और विदेश में रहने वाले भी गांव और घर लौटते हैं तथा छठ घाटों पर सबों से भेंट मुलाकात भी होती है.
