छत्तरगाछ (किशनगंज): भूकंप पीड़ित मो शहबाज आलम कहते हैं कि वह काठमांडू में कई वर्षो से छपाई का काम करते है. 25 अप्रैल को जब भूकंप का झटका महसूस हुआ तो वे लोग कारखाने के अंदर कामकर रहे थे. अपनी जान बचाने के लिए छत से कूदे, तो पैर टूट गया.
अनसार आलम ने कहा कि हम लोग भूकंप से घायल हो गये तो अस्पताल में नेपाल सरकार की तरफ से महज इलाज के नाम पर एक सुई ही दी गयी. अस्पताल में भी काफी संख्या में घायलों के आने से अफरा-तफरी का माहौल था. मो सब्बीर कहते हैं कि भूकंप के बाद खुले आसमान के नीचे चार दिन तक रहे. खाने के लिए कुछ भी नहीं मिल रहा था. दो गुना मूल्य पर पानी की बोतल तथा बिस्कुट खरीद कर खाना पड़ा. इस भूकंप से कारखाने की दीवार ध्वस्त हो गये. जिससे मुङो 15 लाख का नुकसान हुआ है.
मो नाजिर आलम ने भी अपनी दुख भरी दास्तां इसी तरह बयां करते हुए कहा कि हम लोगों ने आंखों से लोगों को बिल्डिंग में दब कर मरते हुए देखा है. जिससे मेरा दिल दहल जाता है.
मो हबीब सीढ़ी वाला चौक में सिलाई का काम करता था. हबीब कहते हैं कि भूकंप के बाद काफी परेशानी ङोलनी पड़ी. नेपाल सरकार की ओर से में कोई सहायता नहीं मिली. लेकिन भारत सरकार की तरफ से एक बोतल पानी तथा पाव रोटी व चुड़ा मिलता था. जिसे खाकर हम लोग किसी तरह जिंदा थे.
मो असीबुल धोबी घाट काठमांडू में छपाई का काम करता है. उन्होंने बताया कि यदि भारत सरकार से हमें मदद नहीं मिलती तो आज हमारी जान नहीं बचती. हम भूखे मर जाते.
मो खलीक कहते हैं कि भूकंप के बाद हम लोगों का हाल बेहाल था. जब भारत सरकार की ओर से 400 बस 300 मलेट्री तथा खाने का पॉकेट आया तब हम लोगों को राहत मिली. हम लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुक्रगुजार है.
मो रफीक, मुन्ना वाहिद आदि ने बताया कि हम लोग कई सालों से अपने परिवार के साथ काठमांडू में नया बाजार में रहते हैं. भूकंप के बाद हम लोग छोटे छोटे बच्चों के साथ भूखे प्यासे तीन दिन तक खुले आसमान में रहे तथा कहीं से भी कोई सहायता नहीं मिल. दो गुने मूल्य पर हम लोग पानी तथा पावरोटी खरीद कर जान बचायी है.
