92 वर्ष से होती है काली मंदिर में माता की पूजा

ठाकुरगंज : 92 वर्ष पूर्व मां काली के मंदिर के अन्दर छोटे से रूप में शुरू हुई मां दुर्गा की पूजा आज नगर की सबसे भव्य पूजा के रूप में स्थापित हो चुकी है. पिछले 9 दशकों में बाजार पूजा समिति ने कई रूप देखे. एक छोटे से टीन के मंदिर में शुरू हुई इस […]

ठाकुरगंज : 92 वर्ष पूर्व मां काली के मंदिर के अन्दर छोटे से रूप में शुरू हुई मां दुर्गा की पूजा आज नगर की सबसे भव्य पूजा के रूप में स्थापित हो चुकी है. पिछले 9 दशकों में बाजार पूजा समिति ने कई रूप देखे. एक छोटे से टीन के मंदिर में शुरू हुई इस पूजा के शुरू होने का इतिहास भी अत्यधिक रोचक है. बलि प्रथा के खिलाफ शुरू हुई इस पूजा के शुरू होने के बाबत स्थानीय लोगों ने बताया की ठाकुरगंज में सबसे पहली पूजा 1921 में रेलवे के पीडब्लूडी कार्यालय में शुरू हुई जहां सभी ठाकुरगंज वासियों ने इस पूजा में सहयोग किया.

परन्तु कुछ मुद्दों पर मतभेद के बाद 1924 में स्व डॉ कमलेश चन्द्र लाहिड़ी के द्वारा लाहिड़ी मिल परिसर में पूजा शुरू हुई. उसी साल पहली ही पूजा में बलि चढ़ने के बाद स्व गणपत राय केजड़ीवाल ने विरोध करते हुए अगले वर्ष से बाजार में अवस्थित काली मंदिर में स्थानीय लोगों के सहयोग से दुर्गा पूजा शुरू की. इसमें उनके साथ स्व मोहन लाल करनानी, स्व कालू राम गाडोदिया,स्व हरिचरण चोधरी, स्व पोरेश दत्ता, स्व डॉ तिनकुडी सरकार आदि थे. पहले पुजारी स्व निहार पंडित थे.

एक छोटे से काली मंदिर में शुरू हुई यह पूजा आज जिस प्रकार भव्य मंदिर में मनाई जा रही है. उसके पीछे सैकड़ो लोगो के सहयोग को याद करते हुए पूजा कमेटी के देवकी अग्रवाल, निरंजन मोर, गोपाल केजड़ीवाल, दुलाल दता कहते है कि स्व ब्रजमोहन चटर्जी, स्व रमेश बनर्जी, स्व महावीर केजड़ीवाल, स्व पन्ना लाल मोर, स्व पन्ना लाल गाडोदिया, स्व श्याम केजड़ीवाल, स्व बद्री गाडोदिया के अलावे कालाचंदा, तपन दा आदि का योगदान भुलाया नहीं जा सकता. पिछले कई वर्षो से इस पूजा कमेटी काफी सक्रिय भूमिका निभाने वाले ठाकुरगंज के मुख्य पार्षद देवकी अग्रवाल बताते है की पिछले 9 दशकों में इस पूजा स्थल में काफी बदलाव हुआ है. काली मंदिर के अन्दर शुरू हुई यह पूजा कुछ वर्षो बाद मंदिर के बरामदे में होने लगी.

धीरे धीरे जैसे जैसे पूजा का आकार बढ़ने लगा पूजा भी वृहत रूप में होने लगी, कभी मंदिर के एक कौने में शुरू हुई पूजा अब मंदिर के बाहर पंडाल के अन्दर होने लगी. फिर छोटे से पंडाल ने भव्य रूप लिया और 1988 में इस जगह एक भव्य मंदिर बन गया. जहां मां दुर्गा संग मां काली की आराधना होने लगी. इस मंदिर में दुर्गा मां की प्रतिमा महाषष्ठी को स्थापित कर विजया दशमी तक विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का भव्य आयोजन किया जाता है. यहां के भव्य धार्मिक अनुष्ठानों को देखने प्रखंड सहित पश्चिम बंगाल व नेपाल से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है.
क्या है मंदिर
का इतिहास
19 वर्ष पूर्व निर्मित ठाकुरगंज सार्वजनिक बाजार दुर्गा पूजा समिति के मंदिर के अंदर कलाकृतियों का निर्माण उड़ीसा व कोलकाता के मूर्तिकारों द्वारा किया गया है. जो काफी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. यहां मां दुर्गा की स्थाई प्रतिमा नहीं है पूजा के दौरान मंदिर परिसर में ही मूर्तिकारों द्वारा मूर्ति का निर्माण किया जाता है.

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