कटिहार जिले के डंडखोरा प्रखंड अंतर्गत उत्क्रमित मध्य विद्यालय संगत टोला की शिक्षिका ज्योति कुमारी ने सरकारी विद्यालय में शिक्षा की पारंपरिक परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है. वे स्कूली शिक्षा को किताबों और कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकालकर बच्चों के प्रत्यक्ष अनुभव, वैज्ञानिक प्रयोग, पर्यावरण, व्यक्तिगत सुरक्षा और सामाजिक सरोकारों से जोड़ रही हैं. उनका मानना है कि एक शिक्षक का दायित्व केवल सिलेबस पूरा कराना नहीं, बल्कि बच्चे के चरित्र और समाज की सोच को तराशना है. स्वयं निर्मित शिक्षण अधिगम सामग्री (TLM), 'निपुण विद्यार्थी सृजन कक्ष', बालिकाओं को 'गुड टच-बैड टच' का पाठ और पोषक क्षेत्र में 'पहले पढ़ाई, फिर विदाई' का अलख जगाकर ज्योति कुमारी आज पूरे सीमांचल में नवाचारी शिक्षा की रोल मॉडल बन चुकी हैं.
कक्षा से बाहर असली दुनिया में पढ़ाई: कुम्हार के चाक से खेतों तक
शिक्षिका ज्योति कुमारी की शिक्षण पद्धति पूरी तरह अनुभवात्मक (Experiential Learning) है:
- खेतों में कृषि और सिंचाई का पाठ: पर्यावरण और विज्ञान की किताबों में छपे पाठों को समझाने के लिए वे बच्चों को सीधे खेतों और बोरिंग स्थलों पर ले जाती हैं, जहां छात्र सिंचाई के आधुनिक साधनों, बीजों और मिट्टी के बारे में सीधे किसानों से सीखते हैं.
- स्थानीय हुनर से परिचय: मिट्टी के बर्तन कैसे बनते हैं, यह सिखाने के लिए बच्चों को गांव के कुम्हार के चाक के पास ले जाया जाता है, जिससे बच्चों में श्रम के प्रति सम्मान और पारंपरिक कला की समझ विकसित होती है.
- TLM और सृजन कक्ष: विद्यालय में उन्होंने अपने निजी प्रयासों से एक अलग टीएलएम कक्ष (TLM Room) विकसित किया है, जहां रंग-बिरंगे चार्ट और मॉडल मौजूद हैं. साथ ही 'निपुण विद्यार्थी सृजन कक्ष' में बच्चों द्वारा बनाई गई पेंटिंग, हस्तशिल्प और साइंस मॉडल प्रदर्शित किए जाते हैं.
शिक्षिका ज्योति कुमारी के प्रमुख नवाचार और सामाजिक पहल
| कार्यक्षेत्र (Focus Domain) | नवाचारी गतिविधियां एवं पहल (Innovative Initiatives) |
| अनुभवात्मक शिक्षण | खेतों का भ्रमण, कुम्हार के चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाने का प्रत्यक्ष अनुभव |
| रचनात्मक ढांचा | अलग TLM कक्ष की स्थापना एवं 'निपुण विद्यार्थी सृजन कक्ष' का निर्माण |
| पर्यावरण एवं जल संरक्षण | इको क्लब के तहत 'जल है तो कल है' अभियान, रेनवाटर हार्वेस्टिंग मॉडल |
| हरित संकल्प | 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान के जरिए माताओं और बच्चों से सैकड़ों पौधारोपण |
| बालिका सशक्तिकरण | 'पहले पढ़ाई, फिर विदाई' से बाल विवाह पर रोक, मासिक धर्म स्वच्छता जागरूकता |
| बाल सुरक्षा व स्वास्थ्य | बच्चियों को गुड टच-बैड टच की ट्रेनिंग, छात्रों को नियमित योग व प्राणायाम |
'पहले पढ़ाई, फिर विदाई': बाल विवाह रोकने और बालिका शिक्षा पर जोर
एक शिक्षक के रूप में ज्योति कुमारी विद्यालय तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका गहरा नाता पोषक क्षेत्र के हर घर से है:
- घर-घर जाकर काउंसिलिंग: ग्रामीण क्षेत्र में बेटियों की कम उम्र में शादी की कुप्रथा के खिलाफ वे अभिभावकों को लगातार जागरूक करती हैं. उनका नारा है— "पहले पढ़ाई, फिर विदाई".
- बाल संसद और मीना मंच: विद्यालय के 'बाल संसद' और 'मीना मंच' के जरिए वे ग्रामीण छात्राओं में मंच पर बोलने का हौसला, नेतृत्व क्षमता और लोकतांत्रिक मूल्यों का बीजारोपण कर रही हैं.
बाल सुरक्षा, माहवारी स्वच्छता और मानसिक स्वास्थ्य
विद्यालय में छात्राओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर बेहद संवेदनशील माहौल तैयार किया गया है:
- गुड टच एवं बैड टच का प्रशिक्षण: छोटी बच्चियों को उनकी उम्र के अनुकूल तरीके से सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श (Good Touch vs Bad Touch) की पहचान कराई जाती है, ताकि वे किसी भी अप्रिय स्थिति में मुखर हो सकें.
- माताओं के साथ हाइजीन वर्कशॉप: किशोरवय छात्राओं और उनकी माताओं को एक साथ बैठाकर माहवारी स्वच्छता (Menstrual Hygiene) और सैनिटरी पैड के उपयोग पर खुलकर चर्चा की जाती है, जिससे हिचक दूर हो सके.
- योग और प्राणायाम: बच्चों में मानसिक एकाग्रता, शारीरिक चुस्ती और तनाव मुक्ति के लिए प्रतिदिन प्रार्थना सभा के बाद विभिन्न योगासनों का नियमित अभ्यास कराया जाता है.
