Kursela News: स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों के बीच कटिहार जिले का एक ऐसा शहादत स्थल है, जहां हर साल श्रद्धांजलि तो दी जाती है, लेकिन जिन वीर सपूतों ने यहां अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेते हुए अपने प्राण न्योछावर किए, उनमें से कई के नाम आज भी इतिहास के अंधेरे में खोए हुए हैं. कुरसेला के देवीपुर रेल पटरी पर 13 अगस्त 1942 को आठ क्रांतिकारियों ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए शहादत दी थी. आजादी के 78 वर्ष बाद भी उनमें से तीन शहीदों की पहचान अब तक नहीं हो सकी है.
यह घटना केवल स्थानीय इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि उस दौर की याद दिलाती है जब महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान पर बिहार के ग्रामीण इलाकों में भी स्वतंत्रता की मशाल जल उठी थी. देवीपुर की यह शहादत उसी जनआंदोलन की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है.
जब रेल पटरी बनी आजादी की रणभूमि
13 अगस्त 1942 को देवीपुर के समीप क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी शासन के विरोध में रेल लाइन की पटरी उखाड़ दी थी. उद्देश्य था ब्रिटिश प्रशासन की आवाजाही और नियंत्रण व्यवस्था को चुनौती देना.
बताया जाता है कि अंग्रेजी टामी पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए चेतावनी दी, लेकिन क्रांतिकारी पीछे नहीं हटे. गोलियां चलने के बावजूद वे ‘भारत माता की जय’ के नारों के साथ डटे रहे और कई युवाओं ने रेल पटरी पर ही अपने प्राण न्योछावर कर दिए.
स्थानीय लोगों के अनुसार उस समय नक्षत्र मालाकार जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के जोश ने साथियों का मनोबल बनाए रखा और अंग्रेजी शासन को कड़ा प्रतिरोध मिला.
आठ शहीद, लेकिन तीन की पहचान अब भी नहीं
देवीपुर रेल पटरी पर शहीद होने वालों की संख्या आठ बताई जाती है. लंबे समय तक इन शहीदों के नाम और पहचान को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं थी.
किसान संघ के प्रयासों से अब तक पांच शहीदों की पहचान हो सकी है. इनमें नटाय परिहार, रमचू यादव, धथूरी मोदी, लालजी मंडल और जागेश्वर महलदार के नाम शामिल हैं.
हालांकि शेष तीन क्रांतिकारियों के नाम और पते आज भी अज्ञात हैं, जो इस ऐतिहासिक घटना की सबसे बड़ी विडंबना मानी जा रही है.
किसान संघ के प्रयास से सामने आए शहीदों के नाम
बरारी-कुरसेला किसान संघ के अध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह और तत्कालीन राज्यसभा सदस्य नरेश यादव के प्रयासों से पांच शहीदों की पहचान सार्वजनिक हो सकी.
स्थानीय इतिहासकारों और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्षों तक तिथियों और शहीदों की संख्या को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रही, जिसे बाद में दस्तावेजों और स्थानीय साक्ष्यों के आधार पर काफी हद तक स्पष्ट किया गया.
स्मृति चिन्ह है, लेकिन भव्य स्मारक अब भी नहीं
देवीपुर रेल लाइन के समीप आज एक छोटा स्मृति चिन्ह मौजूद है, जहां हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस और अन्य राष्ट्रीय अवसरों पर राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक लोग पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.
लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस स्थान पर आठ क्रांतिकारियों ने शहादत दी, वहां आज तक कोई भव्य ऐतिहासिक स्मारक या प्रतिमा स्थापित नहीं की गई. उनका मानना है कि नई पीढ़ी को इस इतिहास से जोड़ने के लिए शहीदों के नामों का संरक्षण और स्मारक का विकास आवश्यक है.
Kursela News: इतिहास को संजोने की जरूरत
स्वतंत्रता संग्राम की ऐसी अनेक स्थानीय घटनाएं राष्ट्रीय इतिहास के बड़े आख्यानों में अक्सर पीछे छूट जाती हैं. देवीपुर की शहादत भी उन्हीं में से एक है. ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इन वीर सपूतों की कुर्बानी को उचित सम्मान तभी मिलेगा, जब उनकी पहचान, इतिहास और स्मृति को स्थायी रूप से संरक्षित किया जाएगा.
13 अगस्त 1942 की यह घटना आज भी यह याद दिलाती है कि आजादी केवल बड़े नेताओं की देन नहीं थी, बल्कि उन गुमनाम ग्रामीण क्रांतिकारियों की भी थी जिन्होंने बिना किसी पहचान या पुरस्कार की उम्मीद के देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया.
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