दीपावली आते ही दीए बनाने में जुटे हैं कुम्हार जाति के लोग

दीपावली आते ही दीए बनाने में जुटे हैं कुम्हार जाति के लोग

लागत के अनुसार कीमत नहीं मिलने से निराशा कोढ़ा प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में दीपावली का पर्व नजदीक आते ही बाजार सजने लगा है. घरों में रौनक लौटने लगी है. लेकिन इस रौशनी के पर्व के पीछे एक ऐसा समुदाय भी है, जो इस उजाले को बनाने में जुटा है. पर खुद अंधेरे में घिरा हुआ है. कुम्हार समुदाय हर साल की तरह इस बार भी कुम्हारों ने दीपावली के लिए मिट्टी के दीयों का निर्माण शुरू कर दिया जो अद्भुत कारीगरों में निपुण हुनर को दिखाते हुए दिन-रात मेहनत कर सैकड़ों-हज़ारों दीये का निर्माण कार्य में जुटे हुए हैं. लेकिन बढ़ती महंगाई, कच्चे माल की लागत और मशीन से बने सस्ते दीयों व इलैक्ट्रोनिक से भरमार दीपों के निर्माण व उसकी बढ़ती मांग की मार के चलते उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा. कुम्हारों की पीड़ा स्थानीय कुम्हार रमेश कुमार कहते हैं, मिट्टी, पानी, लकड़ी, रंग और मेहनत सब कुछ महंगा हो गया है. एक दीया बनाने में अब पहले से दोगुनी लागत लगती है. लेकिन ग्राहक वही पुराने दाम पर लेना चाहते है. बाजार में चाइनीज़ और प्लास्टिक के दीयों ने हमें और भी पीछे कर दिया है. कई कुम्हार परिवारों ने बताया कि इस परंपरागत पेशे से उनका गुज़ारा मुश्किल हो गया है. त्योहार के सीज़न में उम्मीद की जाती है कि कमाई होगी. लेकिन घाटे का डर उन्हें साल भर सताता है. कुम्हार समुदाय को लेकर सरकार की योजनाएं कागज़ों तक सीमित नजर आ रही हैं. प्रशिक्षण, मशीनरी, लोन या बाज़ार उपलब्धता जैसी योजनाओं का लाभ ज़्यादातर कुम्हारों तक नहीं पहुंच पा रहा है. स्थानीय कुम्हार समुदाय की मांग फुलवरिया पंचायत के पचमा गांव निवासी वकील पंडित दीपों के कारीगर व कुम्हार समुदाय की मांग है कि विगत कई वर्षो से एक रूपए की दर से एक दीप की मजबूरन बिक्री करने पर मजबूर हैं. लागत के साथ मेहनत के अनुसार दीपों की दामो में बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है. कम से कम 100 दीपों की कीमत 150 रूपए होनी चाहिए थी. जिससे महंगाई की दौर में आर्थिक स्थिति की मार झेलनी पड़ रही है. साथ ही मांग की है की मिट्टी के दीपों के निर्माण में काफी समय के साथ अधिक मेहनत करनी पड़ती है. जिसके समाधान के लिए सरकार मिट्टी के दीयों को प्रोत्साहित करें. स्कूलों और सरकारी संस्थानों में मिट्टी के दीयों की खरीद स्थानीय कुम्हारों से की जाय. इस कला को संरक्षित करने के लिए विशेष योजनाएं बनाई जायें. इलेक्ट्रॉनिक चायनिज दीपों की ब्रकी पर रोक लगायी जाय.

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By RAJKISHOR K

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