चैनपुर. लोकतंत्र के इस पर्व में अब सब कुछ डिजिटल, भव्य और रणनीतिक हो चुका है. पिछले तीन दशकों में भारतीय चुनाव प्रक्रिया ने ऐसा रूप ले लिया है, जिसमें परंपरा और तकनीक दोनों का अद्भुत संगम दिखता है. 1990 के दशक में जब प्रत्याशी साइकिल, बाइक या जीप से गांव-गांव जाकर हाथ जोड़ते थे, तब चुनाव पूरी तरह जनसंपर्क और व्यक्तिगत भरोसे पर टिका होता था. आज वह दौर प्रचार वाहनों, सोशल मीडिया अभियानों, वीडियो मैसेज और वर्चुअल रैलियों में तब्दील हो चुका है. अब प्रचार के तौर तरीके पूरी तरह बदल चुके हैं. तीन दशकों में चुनाव की प्रक्रिया में कई बदलाव हुए हैं जहां पहले प्रत्याशी अपने मतदाताओं को व्यक्तिगत रूप से भली भांति जानते पहचानते थे, लेकिन अब प्रत्याशियों और मतदाताओं के बीच पार्टी के कार्यकर्ता या डिजिटल मीडिया आ गयी है, जो इन दोनों के बीच सेतु का काम करते हैं. जबकि, पहले मतदाता अपने प्रत्याशी से सीधे तौर पर जुड़े होते थे. # पुराने दौर की सादगी आज के चकाचौंध में हो रही गुम तीन दशक पहले उम्मीदवार का नामांकन दाखिल करने का दृश्य बेहद साधारण होता था. दो-चार समर्थक, एक पुरानी जीप और कुछ कागज.. लेकिन, अब वही नामांकन शक्ति बल और आधुनिकता का प्रदर्शन बन कर रह गया है. प्रत्याशी सैकड़ों वाहनों और समर्थकों के काफिले के साथ नामांकन के लिए पहुंचते हैं. गाड़ियों पर पार्टी के झंडे, बैंड-बाजे और डीजे का शोर माहौल को मेले जैसा बना देता है. राजनीति के जानकार मानते हैं कि यह बदलाव सिर्फ दिखावे का नहीं है, बल्कि जनता तक प्रभाव डालने की रणनीति भी है. चुनाव प्रचार में अब भावनाओं और विकास के साथ-साथ शक्ति प्रदर्शन को भी अहम माना जाने लगा है. कोई प्रत्याशी कितनी बड़ी रैली कर रहा है या उसके रोड शो में कितनी भीड़ उमड़ती है, अब यही उसकी राजनीतिक लोकप्रियता का पैमाना बन चुका है. # डिजिटल युग ने लिखी प्रचार की नयी परिभाषा 1995 या 2000 के चुनावों में प्रचार के मुख्य माध्यम पोस्टर, बैनर, दीवार लेखन और लाउडस्पीकर थे. आज वही प्रचार मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया पोस्ट में सिमट गया है. फेसबुक लाइव, व्हाट्सएप ग्रुप, इंस्टाग्राम रील और एक्स पर चलने वाले ट्रेंड किसी उम्मीदवार के लिए जीत की हवा बना सकते हैं. डिजिटल प्रचार ने खर्च बढ़ा दिया है, लेकिन पुराने प्रचार माध्यमों से कहीं अधिक प्रभावी भी साबित हो रहा है. हाल के विधानसभा चुनावों में देखा गया है कि प्रत्याशी गांवों और छोटे कस्बों तक पहुंचने के लिए मोबाइल वैन कैंपेन और वीडियो प्रचार बस का प्रयोग कर रहे हैं. भाषणों को रिकॉर्ड कर एलइडी स्क्रीन पर दिखाया जाता है, जिससे भीड़ कम होने पर भी संदेश हर मतदाता तक पहुंच जाता है. # लगातार बदल रही मतदाताओं की सोच- तीन दशक पहले मतदाता नेताओं को सीधा पहचानते थे. मोहल्ले की चौपालों या हाट-बाजारों में बैठकों के जरिये विश्वास कायम होता था. अब मतदाता सूचनाओं से लैस हैं और मोबाइल पर उम्मीदवार की पूरी प्रोफाइल देख सकते हैं. युवा मतदाता पहली बार वोट डालते हुए डिजिटल विभाजन का हिस्सा नहीं, बल्कि उसका नेतृत्व कर रहे हैं. लेकिन इसके उलट वृद्ध मतदाताओं में पुरानी चुनावी यादें आज भी ताजा है. मलिक सराय गांव के 81 वर्षीय सीताराम सिंह कहते हैं कि पहले नेता खुद आकर नमस्ते करते थे, कुर्सी पर बैठकर साथ में चाय पीते थे और जनता से बोलचाल में ही एक मधुर संबंध भी बनता था. अब तो कैमरे और सोशल मीडिया के लिए हाथ हिलाकर निकल जाते हैं. जनता को यह देखकर लगने लगा है जैसे अब रिश्ते मात्र दिखावे के रह गये हैं. वहीं, 88 वर्षीय कमला कुंवर बताती हैं कि पहले चुनाव में खर्च बहुत कम होता था. गांव की चौपाल में बैठकर चर्चा होती थी, अब तो बड़ी-बड़ी रैलियां हो रही हैं. लोग दूर से देखने आते हैं, पर असली बात वहीं खो जाती है. # बढ़ता जा रहा चुनावी खर्च और सुरक्षा व्यवस्था – चुनावी तामझाम का एक बड़ा पहलू खर्च का बढ़ना है. निर्वाचन आयोग की गाइडलाइन के बावजूद प्रत्याशी प्रचार में करोड़ों रुपये झोंक रहे हैं. हेलीकॉप्टर रैली, भव्य मंच, हाईटेक प्रचार सामग्री और डिजिटल विज्ञापन ने चुनावी माहौल को कारोबारी स्वरूप दे दिया है. सुरक्षा व्यवस्था भी पहले से कहीं अधिक सख्त हो गयी है. पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती, कैमरा को निगरानी और ड्रोन सर्वे जैसी व्यवस्थाएं अब आम हो चुकी . # चुनाव में महिलाओं और सामाजिक संगठनों की सक्रियता – तीन दशक पहले राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सीमित थी, पर अब हर दल ने महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए विशेष अभियान शुरू किये हैं. स्वयं सहायता समूह और जीविका नेटवर्क अब मतदान प्रतिशत बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. ग्रामीण इलाकों में मतदान उत्सव जैसी पहलें दिखाती हैं कि लोकशाही में बदलाव सिर्फ तकनीक का नहीं, मानसिकता का भी हिस्सा बन चुका है. # रोड शो और व्यक्तिगत ब्रांडिंग का दिख रहा असर – अब प्रत्याशी केवल पार्टी के प्रतीक पर निर्भर नहीं रहते. वे खुद को स्थानीय हीरो के रूप में पेश करते हैं. शहरों और कस्बों में रोड शो इस ब्रांडिंग का सबसे बड़ा उपकरण बन चुका है. बड़े-बड़े होर्डिंग, सजायी गयी गाड़ियां, गीत-संगीत और झंडामेले वाले कारवां से उम्मीदवार अपनी उपस्थिति जताते हैं. यह शैली फिल्मी अंदाज की झलक देती है, लेकिन भीड़ को आकर्षित करने में बेहद कारगर साबित हो रही है. अब चुनाव में प्रत्याशी मतदाताओं से सीधे जुड़ने के बजाय तामझाम में विश्वास कर रहे हैं. ———– # नामांकन से लेकर प्रचार तक बढ़ा तामझाम # रोड शो से शुरू हुआ शक्ति प्रदर्शन का नया दौर
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