भभुआ (नगर) : पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे गांवों में वोट के ठेकेदार सक्रिय होते देखे जा रहे है. अपने-आप को समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति समझते हैं, वे प्रत्याशियों को वोट दिलाने का ठेका ले रहे हैं वहीं, इसके लिए बखानबाजी भी किया जा रही है.
जमीनी सच्चाई यह है कि आज के परिवेश में उन वोटों के ठेकेदारों की पकड़ अपनी पत्नी, पुत्र, पतोहू तक पर नहीं है. लेकिन, वैसे लोग गांव बेचने का ठेका ले रहे हैं. वहीं, आर्थिक रूप से दबंग प्रत्याशी जो सामाजिक सच्चाई को नहीं जानते हैं, वे उन ठेकेदारों के चंगुल में फसते जा रहे हैं. अगर, ठेकेदारी होती भी है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा है. ऐसे एक-दो लोग नहीं, बल्कि कई लोग हैं, जो पंचायत चुनाव में वोट देने के नाम पर दुकान खोल कर बैठे हैं. नाम नहीं छापने की शर्त पर एक शख्स ने बताया कि यह समय तो पांच वर्ष पर मिलता है, जिसका फायदा उठा लेना ही चालाकी व समझदारी है
पंचायत चुनाव में आचार संहिता का अनुपालन सबसे बड़ी चुनौती है. आचार संहिता का अनुपालन नहीं होने से कमजोर तबके के प्रत्याशी मुश्किल में है. गांवों में होली के समय से ही शराब व पैसे का खेल जारी है.
आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद प्रशासन द्वारा भी इस ओर कोई खास ध्यान नहीं दिया जा रहा है. इसके कारण धनबली व बाहुबली पैसे और शराब के बल पर चुनाव परिणाम को प्रभावित करने में लगे हैं. इससे सबसे ज्यादा परेशानी वैसे प्रत्याशियों को हो रही है, जो गरीब हैं व पंचायत चुनाव में पानी की तरह पैसा नहीं बहा सकते हैं.
चुनाव प्रचार पर चढ़ा हाइटेक रंग : नामांकन खत्म होने के बाद पंचायत चुनाव को लेकर गांव-गांव में शतरंज की बिसात बिछा दी गयी है. चुनाव में विभिन्न पदों पर उम्मीदवार बने प्रत्याशी अपने-अपने ढंग से गोटी सेट करने में लगे हैं. इसके लिए अलग-अलग ढंग से प्रचार-प्रसार का तरीका अपनाया जा रहा है.
ए चाची, ए काका देखब जा बहकब जा मत : आजकल गांव में फसलों की कटाई व दबंई का दिन चल रहा है. सुबह शाम गांव की महिलाएं व ग्रामीण खेतों में चले जा रहे हैं.
इस माहौल में प्रत्याशी रात के वक्त लोगों से भेंट कर रहे हैं. कई प्रत्याशी मतदाताओं के दरवाजे पर दस्तक देकर दरवाजा खुलवा कर कहते हैं ए चाची, ए काका दखबजा बहकब जा मत चुनाव चिह्न पर ध्यान देबजा. वहीं, वोटर अपनी चुप्पी बरकरार रखते हुए जिससे प्रत्याशी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि कौन उनका वोटर है. गांव में वोटरों के समक्ष यह भी दुविधा है कि किसके पक्ष में खुल कर सामने आयें. चूंकि, सभी प्रत्याशी करीबी है. इसलिए वोटर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं.
