चंद्रमंडीह : हरितालिका तीज सोमवार को चंद्रमंडीह और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ मनायी जा रही है. सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की मंगलकामना को लेकर निर्जला व्रत रख रही हैं. सुबह से ही घरों में पूजा की तैयारियां शुरू हो गयीं. महिलाओं ने नए वस्त्र धारण कर सोलह श्रृंगार किया और भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा के लिए पूजन सामग्री तैयार की.
पूजा सामग्री की खरीदारी को लेकर बाजारों में बढ़ी चहल-पहल
हरितालिका तीज को लेकर बाजारों में भी रौनक देखने को मिली. महिलाएं पूजन सामग्री, फल, मिठाई, श्रृंगार प्रसाधन और अन्य जरूरी सामान की खरीदारी के लिए बाजार पहुंचीं. शाम को महिलाएं शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करेंगी और हरितालिका तीज की कथा सुनेंगी. इसके बाद सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की मंगलकामना करेंगी.
व्रत की कठोरता से अधिक संकल्प का महत्व
आचार्य पंडित बिनोद शास्त्री ने कहा कि हरितालिका तीज केवल व्रत की कठोरता का पर्व नहीं, बल्कि संकल्प की स्थिरता और अटल निष्ठा का भी प्रतीक है. देवी पार्वती की भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए की गयी तपस्या इस पर्व की मूल भावना से जुड़ी है. श्रद्धा तब और गहरी होती है, जब उसमें संयम, प्रार्थना और धैर्य शामिल हो.
उन्होंने कहा कि तीज की पूजा का केंद्र बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि श्रद्धा, भाव और मन की एकाग्रता होना चाहिए. यह पर्व अपनी परंपराओं के साथ-साथ उनके पीछे छिपे जीवन मूल्यों को समझने का भी अवसर देता है.
नई पीढ़ी को परंपराओं के मूल अर्थ से जोड़ना जरूरी
पंडित बिनोद शास्त्री ने कहा कि बदलते समय में धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने के लिए नई पीढ़ी को उनके महत्व से परिचित कराना जरूरी है. परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब उनके पालन के साथ उनके मूल अर्थ और संदेश को भी समझा जाए. हरितालिका तीज इसी संकल्प, श्रद्धा और संयम का संदेश देती है.
