जमुई से गुलशन कश्यप की रिपोर्ट: कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों, तो हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, वे मंजिल तक पहुंचने से रोक नहीं सकते. जमुई जिले के मलयपुर निवासी कृष्णकांत मिश्रा की कहानी इसी जज्बे और संघर्ष की मिसाल है. आर्थिक तंगी, नौकरी छूटने और कोर्ट-कचहरी के लंबे संघर्ष के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपने बेटे सुकृति माधव मिश्रा को आईपीएस (IPS) अधिकारी बनाया.
नौकरी जाने के बाद शुरू हुआ संघर्षों का दौर
कृष्णकांत मिश्रा ने बीएड के बाद एक कन्या विद्यालय में शिक्षक के रूप में करियर शुरू किया था. लेकिन साल 1994 में सरकार द्वारा विद्यालय की मान्यता समाप्त किए जाने के कारण उनकी नौकरी चली गई. अचानक आए इस संकट के बाद परिवार को पालने के लिए उन्होंने:
- घर-घर जाकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया.
- आमदनी कम पड़ने पर एलआईसी (LIC) की पॉलिसियां बेचीं.
- अपनी पैतृक जमीन पर खेती कर किसी तरह गुजर-बसर किया.
24 वर्षों तक लड़ी कानूनी लड़ाई
अपनी नौकरी और विद्यालय की मान्यता को लेकर उन्होंने हार नहीं मानी और करीब 24 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ी. आखिरकार साल 2008 में उनकी मेहनत रंग लाई और सरकार ने विद्यालय को दोबारा मान्यता दी, जिससे उन्हें फिर से शिक्षक की नौकरी मिल सकी.
बेटे की जिद और पिता का त्याग
कृष्णकांत मिश्रा बताते हैं कि एक समय ऐसा भी आया जब बेटे की पढ़ाई के लिए जमा पैसे बेटी की शादी में खर्च करने की नौबत आ गई थी. वह उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था, लेकिन उन्होंने साहस के साथ परिवार और बच्चों की शिक्षा दोनों को संभाला.
आज पीलीभीत के एसपी हैं सुकृति माधव
पिता के संघर्षों को देखते हुए सुकृति माधव मिश्रा ने भी जी-जान से मेहनत की. वे बचपन से ही मेधावी थे और उनका सपना प्रशासनिक सेवा में जाने का था. अपनी लगन के दम पर उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास की और आईपीएस बने. वर्तमान में सुकृति माधव मिश्रा उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में एसपी के पद पर तैनात हैं. आज मलयपुर ही नहीं, बल्कि पूरा जमुई जिला इस पिता के अटूट धैर्य और पुत्र की सफलता की कहानी को प्रेरणा के रूप में देख रहा है.
