जमुई जिले के बरहट प्रखंड अंतर्गत किऊल-जसीडीह रेलखंड पर ट्रेन की चपेट में आने से दो सगे मासूम भाई-बहन की दर्दनाक मौत हो गई. इस हृदयविदारक हादसे के बाद जो मार्मिक तस्वीर सामने आई, उसने प्रशासनिक संवेदनशीलता और स्वास्थ्य महकमे के दावों की कलई खोलकर रख दी. हादसे में दो बच्चों की जान चले जाने के बाद उनके शवों को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल ले जाने तक के लिए कोई सरकारी व्यवस्था नहीं मिली. न एंबुलेंस मिली, न शव वाहन और न ही कोई प्रशासनिक वाहन उपलब्ध कराया गया, जिसके चलते बेबस परिजनों को बांस-बल्ले के सहारे अपने कंधों पर शवों को ढोने के लिए मजबूर होना पड़ा.
पुलिस पहुंची, लेकिन शव ले जाने का कोई साधन नहीं मिला
हादसे की सूचना मिलते ही मलयपुर थाने की पुलिस स्थानीय चौकीदार के साथ घटनास्थल पर पहुंची और दोनों शवों को अपने कब्जे में लिया:
- व्यवस्था नदारद: नियमानुसार शवों को पोस्टमार्टम के लिए तत्काल सदर अस्पताल भेजा जाना था, लेकिन मौके पर शव वाहन या एंबुलेंस का कोई इंतजाम नहीं था.
- कंधों पर शव ढोने की मजबूरी: घंटों इंतजार के बाद भी जब कोई साधन नहीं मिला, तो परिजनों ने बांस-बल्ले का ढांचा बनाया और अपने कलेजे के टुकड़ों के शवों को कंधों पर लादकर घटनास्थल से गांव तक पैदल ले गए.
गांव में घंटों पड़े रहे शव, बेसुध होते रहे परिजन
व्यवस्था की बेरुखी यहीं समाप्त नहीं हुई. परिजन जब शवों को गांव लेकर पहुंचे, तब भी सदर अस्पताल ले जाने के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं हो सका:
- मातम और बेबसी: एक तरफ घर के दो मासूमों की असमय मौत का असहनीय दर्द और दूसरी तरफ व्यवस्था की लाचारी—घंटों तक दोनों बच्चों के शव गांव में खुले में पड़े रहे.
- रो-रोकर बुरा हाल: सदमे में डूबे माता-पिता और परिजन बार-बार बेसुध हो रहे थे और अपनी बेबसी पर आंसू बहा रहे थे. पूरे गांव में मातम और आक्रोश का माहौल था.
जनप्रतिनिधियों के हस्तक्षेप के बाद टोटो से भेजा गया अस्पताल
गांव में मचे कोहराम और प्रशासनिक उदासीनता को देखते हुए स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने मामले में हस्तक्षेप किया:
- टोटो की व्यवस्था: काफी मशक्कत के बाद एक निजी टोटो (ई-रिक्शा) का जुगाड़ किया गया.
- पोस्टमार्टम के लिए रवानगी: आखिरकार उसी टोटो पर दोनों मासूमों के शवों को लादकर पोस्टमार्टम के लिए जमुई सदर अस्पताल भेजा जा सका.
इस अमानवीय घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि गरीब और बेबस परिवारों के लिए हादसों के बाद भी सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता किस कदर भारी पड़ती है.
