बिहार को झारखंड से जोड़ने वाला एनएच-333 जमुई-चकाई मार्ग बेहद महत्वपूर्ण और व्यस्त सड़क है. इसी मार्ग पर बटिया घाटी के बीच स्थित चिरेन पुल लंबे समय से दुर्घटनाओं के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र बना हुआ है. अंग्रेजों के समय निर्मित इस पुल को बीते कई दशकों से ब्लैक स्पॉट के रूप में चिन्हित किया जाता रहा है. स्थानीय लोगों के अनुसार पिछले दो दशक में यहां दर्जनों सड़क हादसे हो चुके हैं. इन दुर्घटनाओं में कई लोगों की जान जा चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं. सोमवार को पुल के समीप हुए एक और दर्दनाक हादसे में पिता और पुत्री की मौत हो गई, जबकि पत्नी का इलाज चल रहा है. घटना के बाद इलाके में आक्रोश का माहौल है.
पहाड़ों के बीच पुल और दोनों ओर तीखे मोड़ बन रहे जानलेवा
स्थानीय लोगों के मुताबिक चिरेन पुल की सबसे बड़ी समस्या इसकी भौगोलिक स्थिति और सड़क की बनावट है. पहाड़ों के बीच बने इस पुल के दोनों ओर सड़क पर काफी ढलान और तीखे मोड़ हैं. दोनों दिशाओं से आने वाले वाहन चालकों को पुल काफी नजदीक पहुंचने तक दिखाई नहीं देता. अचानक मोड़ के बाद सामने पुल आ जाता है और पुल पार करते ही फिर तीखा मोड़ सामने होता है.
इस स्थिति में इस मार्ग से अनजान वाहन चालकों के लिए खतरा और बढ़ जाता है. खासकर ढलान पर वाहनों की रफ्तार बढ़ जाने के कारण अचानक मोड़ और पुल आने पर चालक को संभलने का पर्याप्त मौका नहीं मिल पाता. पुल पार करने के बाद चढ़ाई और तीखा मोड़ भी परेशानी बढ़ाता है.
जरा सी चूक और हो जाता है बड़ा हादसा
लोगों का कहना है कि पुल की ऊंचाई सड़क के मौजूदा लेवल से काफी नीचे है. इसके कारण ढलान से उतरते समय वाहनों की गति तेज रहती है. ऐसे में अचानक पुल और उसके बाद आने वाले तीखे मोड़ दुर्घटना की आशंका बढ़ा देते हैं.
चिरेन पुल की यही स्थिति लंबे समय से स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है. लोगों का कहना है कि कई बार पुल की ऊंचाई, सड़क की बनावट और दोनों तरफ के घुमावदार मोड़ को लेकर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया.
पिता-पुत्री की मौत के बाद फिर उठा बदलाव का मुद्दा
सोमवार को हुए हादसे ने एक बार फिर चिरेन पुल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. हादसे में पिता और पुत्री की दर्दनाक मौत के बाद स्थानीय लोगों में नाराजगी देखी गई. लोगों का कहना है कि यदि समय रहते पुल और आसपास की सड़क की स्थिति को दुरुस्त किया जाता तो शायद हादसे की आशंका को कम किया जा सकता था.
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि पुल की ऊंचाई और सड़क की संरचना का तकनीकी स्तर पर अध्ययन कराया जाए. दोनों तरफ के घुमावदार मोड़ को कम करने के साथ सड़क की ढलान को भी सुरक्षित बनाया जाए, ताकि वाहन चालकों को पुल के पहले और बाद में पर्याप्त दृश्यता मिल सके.
आधुनिक तकनीक के दौर में समाधान संभव
ग्रामीणों का कहना है कि बटिया घाटी के इस क्षेत्र में आए दिन सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं दिख रही है. लोगों के अनुसार एनएच-333 बिहार और झारखंड को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण मार्ग है और इस पर हर दिन बड़ी संख्या में वाहन गुजरते हैं.
ऐसे में दुर्घटनाओं को कम करने के लिए चिरेन पुल और उसके आसपास की सड़क की संरचना में जरूरी बदलाव करना बेहद महत्वपूर्ण है. लोगों का कहना है कि आज आधुनिक तकनीक के दौर में पुल और सड़क की खामियों को दूर करना नामुमकिन नहीं है. जरूरत सिर्फ मजबूत इच्छाशक्ति और गंभीर पहल की है. यदि विभाग इस ब्लैक स्पॉट की समस्या का स्थायी समाधान करता है तो भविष्य में कई परिवारों को सड़क हादसों के दर्द से बचाया जा सकता है.
