गिद्धौर (जमुई) : जमुई जिले के गिद्धौर प्रखंड स्थित गंगरा गांव के बाबा कोकिलचंद धाम के करीब 700 वर्ष पुराने इतिहास और धार्मिक महत्ता से अब देश-दुनिया के लोग रूबरू हो सकेंगे. जिला प्रशासन ने बाबा कोकिलचंद से संबंधित ऐतिहासिक सामग्री और संग्रह को जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है. इसके बाद इस ऐतिहासिक स्थल को व्यापक पहचान मिलने और पर्यटन मानचित्र पर जगह बनाने की उम्मीद बढ़ गयी है.
बाबा कोकिलचंद के इतिहास और उनसे जुड़ी परंपराओं का संग्रह गंगरा निवासी शिक्षक चुनचुन कुमार ने तैयार किया है. इस कार्य के लिए अशोका पब्लिक स्कूल के चेयरमैन अशोक कुमार सिंह ने उन्हें बधाई दी. उन्होंने कहा कि बाबा कोकिलचंद से जुड़ा इतिहास और उनकी महत्ता लंबे समय से स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र रही है. अब इसके डिजिटल रूप में उपलब्ध होने से देश-दुनिया के लोग भी इस धरोहर के बारे में जानकारी हासिल कर सकेंगे.
कौन थे बाबा कोकिलचंद?
स्थानीय परंपरा के अनुसार बाबा कोकिलचंद को मानवदेव के रूप में माना जाता है. करीब 700 वर्ष पूर्व उनका जन्म पदूमपुर में एक भूमिहार ब्राह्मण परिवार में होने की मान्यता है. उनके पिता का नाम ठाकुर रूपचंद्र बताया जाता है.
बताया जाता है कि बाबा कोकिलचंद पहले सिकंदरा के कैयार और फिर अचारी गांव में रहे. बाद में वे अपने परिवार के साथ गंगरा आकर बस गये. उनके जीवन से जुड़ी कई कथाएं आज भी स्थानीय स्तर पर प्रचलित हैं.
बाघ से सामना करने की कहानी
स्थानीय मान्यता के अनुसार एक बार जंगल में लकड़ी काटने के दौरान बाबा कोकिलचंद पर एक विशाल बाघ ने हमला कर दिया. उन्होंने साहस और शक्ति से बाघ का सामना किया और उसे मार गिराया.
इसके बाद मां भवानी की कृपा से उन्हें अलौकिक शक्ति प्राप्त होने की मान्यता है. इसी घटना के बाद वे स्थानीय लोगों के बीच कोकिलचंद देव के रूप में पूजे जाने लगे.
चंदेल राजवंश ने भी माना आराध्य
स्थानीय इतिहास और परंपरा के अनुसार गिद्धौर के चंदेल राजवंश के महाराजा ने भी बाबा कोकिलचंद की शक्ति को स्वीकार किया था. उन्हें अपना आराध्य मानते हुए पिंड स्वरूप उनकी स्थापना कर पूजा-अर्चना शुरू कराने की बात कही जाती है.
गंगरा में आज भी बाबा कोकिलचंद की पूजा-अर्चना की परंपरा जारी है. विभिन्न इलाकों से श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा करते हैं और अपनी आस्था प्रकट करते हैं.
शराब से दूरी का संदेश भी जुड़ा है परंपरा से
बाबा कोकिलचंद से जुड़ी प्रमुख स्थानीय मान्यताओं में शराब से दूरी का संदेश भी शामिल है. ग्रामीणों के अनुसार बाबा ने शराब का सेवन नहीं करने का संदेश दिया था और इसे यश, बल, धन एवं वैभव में वृद्धि से जोड़ा था.
स्थानीय लोगों का दावा है कि इस मान्यता का प्रभाव गंगरा में पीढ़ियों से कायम है. ग्रामीणों के अनुसार गांव के लोगों ने लंबे समय से शराब से दूरी बनाये रखी है. इसी वजह से गंगरा को शराब मुक्त गांव के रूप में भी पहचान मिलने की बात कही जाती है.
डिजिटल संग्रह से बढ़ेगी पहचान
अब तक बाबा कोकिलचंद से जुड़ी जानकारी मुख्य रूप से स्थानीय लोगों और परंपराओं तक सीमित थी. जिला प्रशासन की वेबसाइट पर सामग्री उपलब्ध होने से इस विरासत को डिजिटल मंच मिला है. इससे शोधकर्ताओं, श्रद्धालुओं और इतिहास एवं संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी गंगरा की इस धरोहर तक पहुंच आसान होने की उम्मीद है.
स्थानीय लोगों का मानना है कि बाबा कोकिलचंद से जुड़ी ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जानकारी को व्यवस्थित रूप से सामने लाने से गंगरा को जिले के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में पहचान मिल सकती है.
