Hajipur News (कैफ अहमद) : वैशाली जिले के हाजीपुर से सन 1883 ई० की एक अत्यंत दुर्लभ पाण्डुलिपि मिली है. यह पाण्डुलिपि संत मंगनी राम जी से संबंधित मानी जा रही है. संत मंगनी राम जी का जन्म वर्ष 1643 ई० में हुआ था और वे सत्रहवीं शताब्दी के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं. बताया जाता है कि वे उस समय हाजीपुर क्षेत्र में पेशकार के पद पर कार्यरत थे. उनकी आध्यात्मिक साधना और संत स्वरूप व्यक्तित्व से प्रभावित होकर तत्कालीन शासकों ने उन्हें सांसारिक दायित्वों से मुक्त कर जनकल्याण एवं साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने का अवसर दिया था.
कैथी लिपि में लिखी है पाण्डुलिपि
प्राप्त पाण्डुलिपि लगभग वर्ष 1883 ई० की मानी जा रही है, जो अत्यंत प्राचीन एवं दुर्लभ दस्तावेजों में शामिल है. यह कैथी लिपि में लिखी गई है. इसकी भाषा और लिपि इतनी जटिल है कि इसे सामान्य रूप से पढ़ पाना संभव नहीं है. विशेषज्ञ अक्षर-दर-अक्षर और ध्वनि-सामंजस्य के आधार पर इसका अध्ययन कर रहे हैं.
700 वर्षों पुरानी वंशवाली और अभिलेख भी प्राप्त हुए
वही सहदेई प्रखंड के कुम्हारकौल गांव निवासी अमरनाथ सिंह देव के आवास से लगभग 700 वर्ष पुरानी “रामपुरिया दरबार” से संबंधित महत्वपूर्ण राजवंशीय वंशावली एवं ऐतिहासिक अभिलेख भी प्राप्त हुए हैं. इन दस्तावेजों को डिजिटल स्वरूप में सुरक्षित करते हुए “ज्ञान भारतम्” पोर्टल पर अपलोड करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. यह वंशावली मेवाड़, राजस्थान की प्राचीन राजवंशीय परंपरा, पारिवारिक इतिहास, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जा रही है. कई पीढ़ियों से सुरक्षित रखे गए इन अभिलेखों में तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था, वंश क्रम, पारिवारिक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों की झलक देखने को मिलती है.
ज्ञान भारतम् मिशन का उद्देश्य सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है
ज्ञान भारतम् मिशन का उद्देश्य केवल प्राचीन दस्तावेजों का संरक्षण नहीं, बल्कि बिहार और वैशाली की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी है. ऐसी पाण्डुलिपियां हमारी ऐतिहासिक चेतना और आध्यात्मिक परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं, जिनका संरक्षण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है.
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