hajipur news. बुद्ध का महाप्रसाद काला नमक चावल लौटा बिहार, लालगंज के किसान ने शुरू की खेती

इसका जिक्र चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा-वृतांत में भी मिलता है, इस धान का चावल सुगंधित, सुस्वाद और सेहत से भरपूर होता है

लालगंज. बिहार में कई वर्षाें में पहली बार ‘काला नमक धान’ की खेती वैशाली जिले के लालगंज प्रखंड के नामीडीह गांव में शुरू हुई है. काला नमक चावल की पैदावार उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में गौतम बुद्ध के जमाने से हो रही है. इसका जिक्र चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा-वृतांत में भी मिलता है. इस धान से निकला चावल सुगंधित, सुस्वाद और सेहत से भरपूर होता है. इस चावल में एक्सपोर्ट की अपार संभावनाएं हैं, क्योंकि यह ऐतिहासिक रूप से गौतम बुद्ध से जुड़ा माना जाता है.

विदेशों में किया जा रहा खूब पसंद

यह धान विशेषकर कंबोडिया, थाइलैंड, म्यांमार, भूटान, श्रीलंका, जापान, ताइवान और सिंगापुर जैसे देशों में काफी पसंद किया जा रहा है, क्योंकि वहां बौद्ध धर्म के अनुयायी अधिक हैं. इस चावल में शुगर बहुत कम और जिंक की मात्रा अधिक होती है. यह स्वाद में लाजवाब, खुशबूदार और घी जैसा मुलायम होता है. यह बासमती की तुलना में अधिक मुलायम और अधिक सुगंधित है. चावल की इस विशेष किस्म में शुगर नहीं होता है, लेकिन प्रोटीन, आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. इसमें जहां जिंक चार गुना, आयरन तीन गुना और प्रोटीन दो गुना अन्य किस्मों की तुलना में अधिक पाया जाता है. यही वजह है कि इसकी विदेशों में मांग बढ़ रही है.

काले रंग की भूसी के कारण पड़ा नाम

काला नमक चावल बहुत ही उच्च गुणवत्ता वाला चावल है. काले रंग की भूसी के चलते इसका नाम ‘काला नमक चावल’ पड़ा. इसके महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह चावल सीधे भगवान बुद्ध से जुड़ा माना जाता है और इसे ‘महात्मा बुद्ध का महाप्रसाद’ भी कहा जाता है. इस चावल का इतिहास कम से कम 600 ईसा पूर्व या बौद्ध काल से जुड़ा माना जाता है. सिद्धार्थनगर काला नमक चावल के लिए प्रसिद्ध है. हालांकि, बौद्ध काल में बिहार के वैशाली इलाके में भी इसकी खेती होती थी. माना जाता है कि बौद्ध क्षेत्र के आसपास ही इसकी गुणवत्ता और खुशबू सर्वोत्तम रहती है. अन्यत्र खेती करने पर इसकी गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं रहती. तुलनात्मक रूप से भी वैशाली की मिट्टी अधिक उपजाऊ मानी जाती है.

हृदय रोगों की रोकथाम में कारगर

गंगा और नारायणी नदियों से घिरी यह भूमि, जिसके बीच से वाया और नून नदियां गुजरती हैं, इस किंवदंती को और बल देती हैं. इस चावल में एंथोसायनिन जैसे एंटीऑक्सिडेंट पाए जाते हैं, जो हृदय रोग की रोकथाम में सहायक होते हैं. इसके अलावा यह त्वचा के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है. यह चावल आयरन और जिंक से भरपूर है और शरीर में विटामिन की कमी नहीं होने देता. इसे ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने और खून से संबंधित समस्याओं में भी मददगार पाया गया है. इसके अलावा इसमें प्रोटीन भी अच्छी मात्रा में पाई जाती है. पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण विदेशों में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है.

2013 में दिया गया जीआइ टैग

काला नमक चावल को वर्ष 2013 में जियोग्राफिकल इंडिकेटर (जीआई टैग) प्रदान किया गया था, जिससे सिद्धार्थनगर और आसपास के जिलों को इसे लेकर आधिकारिक मान्यता मिली. जीआई रजिस्ट्री जर्नल में भी इसका उल्लेख है. बिहार में पहली बार वैशाली जिले के लालगंज प्रखंड के नामीडीह गांव में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किसान जितेंद्र सिंह ने इस धान की खेती की है. पिछले कई वर्षों से जितेंद्र सिंह द्वारा कई विशेष किस्मों के धान की खेती की जा रही है. उन्होंने इसी साल यूपी से 11 केजी धान खरीदा था और एक एकड़ में इसकी खेती कर रहे हैं.

इस संबंध में आत्मा के उप परियोजना निदेशक सियाराम साहू ने बताया कि जितेंद्र कुमार सिंह के यहां काला नमक चावल की खेती की गयी है, जिसे बुद्ध का महाप्रसाद कहा जाता है. यह चावल काफी सुगंधित है और कई गंभीर बीमारियों से लड़ने की क्षमता रखता है. यदि बिहार में किसान इस चावल की खेती करें, तो उन्हें बेहतर उत्पादन के साथ अच्छी कीमत भी मिल सकती है. इसकी खेती को बढ़ावा दिया जायेगा.

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Author: GOPAL KUMAR ROY

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