सीडीपीओ कार्यालय में लटका रहता है ताला, योजनाओं के संचालन पर उठ रहे सवाल

Gopalganj News: कर्मियों की कमी और अतिरिक्त प्रभार से प्रभावित हो रही आंगनबाड़ी व्यवस्था, सेविकाओं ने भुगतान, ड्रेस योजना और संसाधनों की कमी को लेकर जताई नाराजगी

Gopalganj News: (अखिल कुमार)
प्रखंड मुख्यालय स्थित बाल विकास परियोजना कार्यालय (सीडीपीओ कार्यालय) की व्यवस्था इन दिनों पूरी तरह सवालों के घेरे में है. कार्यालय में अक्सर ताला लटका रहने से सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं का लाभ ग्रामीण क्षेत्रों तक समय पर नहीं पहुंच पा रहा है. आंगनबाड़ी सेविकाओं, सहायिकाओं और लाभुकों को विभिन्न कार्यों के लिए बार-बार कार्यालय का चक्कर लगाना पड़ रहा है, लेकिन अधिकांश समय उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता है.

स्थानीय लोगों और सेविकाओं का कहना है कि सीडीपीओ के कई प्रखंडों का प्रभार संभालने के कारण मांझा कार्यालय को पर्याप्त समय नहीं मिल पाता, जिसका सीधा असर योजनाओं के संचालन पर पड़ रहा है.

250 आंगनबाड़ी केंद्रों की निगरानी में परेशानी

जानकारी के अनुसार मांझा प्रखंड की 20 पंचायतों में करीब 250 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं. बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के पोषण एवं देखभाल की जिम्मेदारी विभाग पर है, लेकिन विभागीय उदासीनता के कारण व्यवस्थाएं चरमराई हुई हैं.

बताया जाता है कि यहां लेडी सुपरवाइजर (एलएस) के नौ पद स्वीकृत हैं, जबकि वर्तमान में केवल पांच एलएस ही कार्यरत हैं. ऐसे में सीमित कर्मियों को पूरे प्रखंड के केंद्रों की निगरानी करनी पड़ रही है, जिससे नियमित निरीक्षण और योजनाओं की समीक्षा प्रभावित हो रही है.

सेविकाओं को करना पड़ रहा बार-बार चक्कर

सेविकाओं का कहना है कि सीडीपीओ संगीता कुमारी चार अलग-अलग प्रखंडों के प्रभार में हैं. इसी कारण मांझा कार्यालय में उनकी उपस्थिति काफी कम रहती है. कई बार सेविकाएं आवश्यक कागजात, भुगतान संबंधित समस्याएं और अन्य विभागीय कार्य लेकर कार्यालय पहुंचती हैं, लेकिन कार्यालय बंद मिलने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता है.

स्थिति यह है कि कार्यालय में बड़े बाबू का भी प्रभार चल रहा है. नियमित कर्मियों की कमी के कारण कार्यालय का अधिकांश कार्य डाटा ऑपरेटर के भरोसे संचालित हो रहा है.

डाटा ऑपरेटर पर पैसे मांगने का आरोप

कई आंगनबाड़ी सेविकाओं ने आरोप लगाया कि कुछ कार्यों के लिए डाटा ऑपरेटर द्वारा मनमाने तरीके से पैसे की मांग की जाती है. हालांकि इस आरोप की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन सेविकाओं में इसे लेकर काफी नाराजगी है. उनका कहना है कि समय पर भुगतान, रिपोर्ट या अन्य कार्य कराने के लिए अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

ड्रेस योजना की गुणवत्ता पर सवाल

आंगनबाड़ी सेविकाओं ने बच्चों को मिलने वाली ड्रेस योजना को लेकर भी असंतोष जताया. सेविकाओं ने बताया कि पहले विभाग द्वारा प्रति बच्चा 400 रुपये की राशि उपलब्ध कराई जाती थी, जिससे स्थानीय स्तर पर बच्चों के माप के अनुसार कपड़े तैयार कराए जाते थे.

लेकिन अब यह जिम्मेदारी जीविका समूह को दे दी गई है. सेविकाओं का आरोप है कि अब मिलने वाले कपड़ों की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं है. कई बच्चों को बड़े आकार के कपड़े मिल रहे हैं, जबकि कई बच्चों के लिए कपड़े छोटे पड़ रहे हैं. इससे अभिभावकों में भी नाराजगी है.

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लेखक के बारे में

Published by: Vivek Pandey

विवेक रंजन पांडेय का जन्म और पालन-पोषण बिहार के गौरवशाली इतिहास और ज्ञान की भूमि नालंदा में हुआ. इसी पावन धरती के संस्कारों ने उन्हें समाज और व्यवस्था को गहराई से देखने का नजरिया दिया. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को करियर बदलने के लिए उन्होंने पटना के आर्यभट्ट विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की. पिछले 7 वर्षों से टीवी चैनल के जरिए रिपोर्टिंग फील्ड में लगातार सक्रिय हैं. Network 10 National News Channel से करियर की शुरुआत की. उसके बाद कई संस्थानों में काम किया. शिक्षा और राजनीति के साथ कृषि, महिला सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर विशेष रूचि रखते हैं. पत्रकारिता की बारीकियों को सीखा और ग्राउंड जीरो पर रहकर जनता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. वर्तमान में Prabhat Khabar के माध्यम से बिहार की खबरों को एक नया आयाम दे रहे हैं. वे बिहार की राजनीति के साथ-साथ देश की सियासी हलचलों पर भी पैनी नजर रखते हैं. अपने शानदार करियर में उन्होंने ​बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जब वह उप मुख्यमंत्री थे तब इंटरव्यू किया. इसके साथ कैबिनेट के अधिकांश प्रमुख मंत्रियों का विशेष इंटरव्यू किया है. ​बिहार के शीर्ष नेताओं और नौकरशाहों को बहुत करीब से देखा, समझा और उनकी नीतियों का निष्पक्ष विश्लेषण किया. ​जटिल राजनीतिक घटनाक्रमों को बेहद सरल भाषा में जनता के सामने पेश किया है.

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