Freedom Fighter Baccha Prasad Shah Story: वर्ष 1942 में जब महात्मा गांधी के आह्वान पर देश भर में 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन की ज्वाला धधक रही थी, तब गोपालगंज के भोरे इलाके में युवाओं और छात्रों के बीच क्रांति का बिगुल फूंकने वाले प्रमुख नायक बने बच्चा प्रसाद शाही. बरैठा गांव निवासी देवनारायण शाही एवं बासमती देवी के पुत्र बच्चा प्रसाद शाही के अदम्य साहस और त्याग की गाथा आज भी क्षेत्र के लोगों के दिलों में गर्व का संचार करती है.
Bacha Prasad Shahi: छात्रों के बीच से उठी थी आजादी की हुंकार
घटना संभवत: 9 अगस्त 1942 की सुबह करीब 10 बजे की है. भोरे थाना क्षेत्र के अहियापुर स्थित मिडिल इंग्लिश स्कूल में छात्र पढ़ने पहुंचे थे. इसी दौरान खबर फैली कि महात्मा गांधी सहित देश के शीर्ष नेताओं को अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया है. देश भर में छात्र पढ़ाई छोड़कर मैदान में कूद रहे थे. तभी वहां पहुंचे बच्चा प्रसाद शाही ने गगनभेदी नारे लगाकर छात्रों का नेतृत्व संभाला. देखते ही देखते छात्रों का विशाल हुजूम उनके साथ हो लिया और पूरे इलाके में अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह शुरू हो गया.
अंग्रेजी फौज को पीछे धकेल भोरे थाने पर फहराया तिरंगा
आंदोलन के दौरान बच्चा प्रसाद शाही और उनके साथियों ने भोरे थाना परिसर से यूनियन जैक हटाकर तिरंगा फहराने का साहसिक फैसला लिया. इसकी भनक लगते ही ब्रिटिश हुकूमत ने जिला मुख्यालय से अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया. तय योजना के अनुसार सुबह 11 बजे बच्चा प्रसाद शाही आंदोलनकारियों के भारी काफिले के साथ भोरे थाने पहुंचे. सामने हथियारबंद अंग्रेजी फौज तैनात थी, लेकिन आंदोलनकारियों के गगनभेदी जोश और निडरता के आगे अंग्रेजी पुलिस को पीछे हटना पड़ा और जांबाज क्रांतिकारियों ने थाने पर तिरंगा फहरा दिया.
जेल की सलाखों में भी 26 जनवरी को फहरा दिया तिरंगा
11 दिसंबर 1942 को जब कड़ाके की ठंड में वे भोरे में आयोजित एक गुप्त बैठक में भाग लेने जा रहे थे, तभी तत्कालीन थानाध्यक्ष विक्रमाजीत सिंह ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. मजिस्ट्रेट ने उन्हें 2 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई. जेल प्रवास के दौरान उन्हें हजारीबाग सेंट्रल जेल और पटना कैंप जेल में रखा गया, जहां उनका संपर्क शाह उजैर मुनीबी, प्रो. अब्दुल बारी, अनुग्रह नारायण सिंह (अनुग्रह बाबू), दीपू बाबू और ललितेश्वर शाही जैसी महान विभूतियों से हुआ.
अंग्रेजी हुकूमत के पहरे के बावजूद जनवरी 1943 में उन्होंने जेल के अंदर ही तिरंगा बनाने की योजना बनाई और 26 जनवरी 1943 को सलाखों के भीतर तिरंगा फहरा दिया. इस अभूतपूर्व घटना से बौखलाई अंग्रेजी पुलिस ने जेल में उनकी बेरहमी से पिटाई भी की. बच्चा प्रसाद शाही बाबा राघव दास और जगदेव पांडेय को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे.
आजादी के बाद शिक्षा के क्षेत्र में लिखी नई इबारत
1947 में देश के आजाद होने के बाद बच्चा बाबू ने अपना पूरा जीवन समाज सेवा और शिक्षा के प्रसार में समर्पित कर दिया. उन्होंने गांधी स्मारक हाई स्कूल भोरे, सहयोगी उच्च विद्यालय विजयीपुर, अहियापुर, कोयलादेवा और कुसौंधी के विद्यालयों के साथ-साथ बीपीएस (BPS) कॉलेज भोरे की स्थापना में ऐतिहासिक योगदान दिया.
वर्ष 1999 में इस महान स्वतंत्रता सेनानी का निधन हुआ. उनके तीन पुत्रों में से राजेंद्र शाही का निधन हो चुका है, जबकि मस्तराज शाही और विनय कुमार शाही समाज में सक्रिय हैं. विनय कुमार शाही वर्तमान में बिहार को-ऑपरेटिव फेडरेशन के चेयरमैन हैं. स्वतंत्रता आंदोलन और शिक्षा जगत में उनके अतुलनीय योगदान को नमन करते हुए गांधी स्मारक हाई स्कूल में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है.
