पेड़े के कारोबार ने दो दर्जन हाथों को दिये रोजगार
भोरे : लखरावं की याद आज शंकर बाबा के पेड़ों और गुलाब जामुन ने संजोये रखी है. कभी वीरान हुआ करता लखरावं बाग आज पेड़े का कुटीर उद्योग बनता जा रहा है. 45 वर्ष पूर्व शुरू हुए इस सफर में आज दो दर्जन से ज्यादा लोग शामिल हैं. भोरे प्रखंड के हथुआ-भोरे मुख्य मार्ग पर स्थित लखरावं में 92 वर्षीय शंकर तिवारी के हाथों का बना गुलाब जामुन और पेड़ा खाने के लिए लोग बरबरस ही रुक जाते हैं. लगभग साढ़े चार दशक पूर्व जब भोरे प्रखंड के तिवारी चकिया गांव निवासी शंकर तिवारी ने लखरावं की सुनसान जगह पर अपनी दुकान खोली थी,
तो सड़क की एक तरफ हथुआ राज द्वारा निर्मित भगवान शंकर का मंदिर और दूसरी तरफ शंकर तिवारी के पेड़े की दुकान थी. किसी ने सोचा भी नहीं था कि इस वीरान जगह पर एक दुकान से दो दर्जन दुकानें हो जायेंगी. शंकर तिवारी ने पेड़ा और गुलाब जामुन की दुकान खोल कर अपनी व्यवस्था तो सुदृढ़ की ही, लगभग दो दर्जन से ऊपर हाथों को रोजगार भी दे डाला.
उनके पेड़े और लालमोहन की क्वालिटी इतनी मशहूर हुई कि उस मुख्य मार्ग से गुजरने वाले लोग बरबस ही उनकी दुकान के सामने ब्रेक लगा देते हैं. उनके पेड़े की क्वालिटी और उसकी देसी मिठास लोगों को वहां रुकने पर मजबूर कर देती है. हालांकि आज भी लखरावं में लगभग 20 से 22 पेड़ों की दुकानें खुली हैं.
लेकिन, शंकर तिवारी के पेड़े और लालमोहन की क्वालिटी, शुद्धता और देसी मिठास किसी और दुकान ने नहीं दी. वीरान लखरावं में उनके बसने के बाद विद्युत उपकेंद्र से लेकर गंडक कॉलोनी, शंकर उच्च विद्यालय सहित दो दर्जन से ऊपर पेड़ों की दुकानें खुलीं और वीरान लखरावं बाग में रौनक दिखाई देने लगी. यह भी एक हकीकत है कि लखरावं के पेड़े सीवान, देवरिया, गोपालगंज तक मशहूर हैं. वहीं हथुआ अनुमंडल के पदाधिकारियों से लेकर कर्मचारी तक सब यहां के पेड़े और गुलाब जामुन के मुरीद हैं.
