गोपालगंज : थोड़ी सी उलटी हुई तो घरवालों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लग रही हैं. डॉकटर पेसेंट को देखते ही कांप जा रहे हैं. शाम ढलते ही कई महकमों में चर्चा हो रही है कि किसकी फाइल तैयार की जा रही है. चर्चा है आखिर अब किसकी अरथी उठेगी? एक ऐसा दर्द जो थमने का नाम नहीं ले रहा है. साढ़े चार माह पूर्व नयी शराब नीति घोषित करते हुए शराबबंदी लगायी गयी. हर जगह, हर तबके में जश्न मनाया गया. पुलिस विभाग ने चैन की सांस ली. शराबबंदी से अपराध घटा,
सड़क हादसों की आंकड़ा घटा, इससे उत्साहित समाज और समाज के पहरूए सोते रहे. शौकीन दो घूंट को तलाशते रहे और धंधेबाज नई तरकीब खोज अपना धंधा चलाते रहे. शराब का बिकना कम नही हुआ अलबता दर बढ़ गये. क्वालिटी डेंजरस हो गयी और चल पड़ा मौत का खेल.
एक सप्ताह पूर्व जिला में शराब ने कइयों को निगल लिया. सरकार आंकड़े छोड़ दिये जाय तो 27 से अधिक परिवार बिलख रहे हैं. सवाल यह है कि आखिर यह स्थिति आई क्यों ? मौत के रूप में धंधेबाजों ने एक ऐसा तुफान लाया जिसने जिले को हिला कर रख दिया.
