श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु सुगत वास थेरो एवं डॉ. के. श्री सुमेधा थेरो अपनी टीम के सहयोगियों के साथ सोमवार को प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल भुरहा पहुंचे. यहां उन्होंने पीपल के वृक्ष के नीचे विराजमान भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा का दर्शन कर उसका गहन अध्ययन किया. इस दौरान बौद्ध भिक्षुओं ने प्रतिमा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना भी की.
इसके अलावा, टीम ने दुब्बा गढ़ के समीप स्थित मंदिर में काले रंग की बुद्ध प्रतिमा, संग्रहालय कक्ष में रखे विभिन्न प्राचीन अवशेषों तथा भुरहा के आसपास बिखरी पड़ी खंडित बुद्ध प्रतिमाओं का भी बारीकी से अवलोकन किया. टीम के सदस्यों ने प्राचीन अवशेषों और उनसे संबंधित ऐतिहासिक जानकारियों को बेहद गंभीरता से देखा तथा कई महत्वपूर्ण स्थलों व मूर्तियों की तस्वीरें अपने कैमरों में कैद कीं.
भुरहा के ऐतिहासिक एवं बौद्धकालीन महत्व की ली जानकारी
भुरहा समिति के पूर्व अध्यक्ष राजदेव प्रसाद ने बताया कि श्रीलंका से पहुंचे सभी विशिष्ट अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया गया. उन्होंने भुरहा के ऐतिहासिक एवं बौद्धकालीन महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की.
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भगवान बुद्ध के सारनाथ जाने के क्रम में भुरहा में ठहरने से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक प्रमाणों के बारे में भी उन्होंने काफी गहराई से जानकारी हासिल की. उन्होंने बताया कि भुरहा से जुड़े प्राचीन पत्थरों पर लिखे शब्दों को भी टीम ने अपने कैमरे में सुरक्षित किया है.
दुब्बा परिसर का भ्रमण कर वाराणसी के लिए हुए रवाना
अध्ययन के इस क्रम में श्रीलंका से आई टीम ने उत्क्रमित उच्च विद्यालय दुब्बा के परिसर में पड़े पत्थर के आसन समेत कई अन्य प्राचीन पत्थरों का भी अवलोकन किया. भुरहा और आसपास के क्षेत्रों का ऐतिहासिक अध्ययन पूरा करने के बाद यह बौद्ध भिक्षु टीम गुनेरी के रास्ते वाराणसी के लिए रवाना हो गई.
इस अवसर पर प्रधानाध्यापक सुमंत कुमार, शिक्षक उपेंद्र कुमार सहित क्षेत्र के सैकड़ों ग्रामीण और बौद्ध धर्म के अनुयायी मौजूद रहे.
