Bihar Makhana Export to Australia : कृषि विज्ञान सहित विज्ञान की शाखाओं में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश समय की आवश्यकता है. वस्तुतः भारत का ज्ञान भारत की भाषाओं में छिपा हुआ है और भारतीय भाषाओं का समान रूप से विकास एवं विस्तार और शिक्षण-प्रशिक्षण में उसका उपयोग सरकार की प्राथमिकता है.
आज विषयों को भी पढ़ाते समय भाषाई आजादी की आवश्यकता है. कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी), गया के कृषि विभाग एवं भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रारंभिक कार्यशाला के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में यह बातें कहीं.
'भारतीय भाषा पारितंत्र का निर्माण : कृषि विज्ञान के कार्यक्रमों एवं पाठ्यक्रमों का मानचित्रण' विषय पर आयोजित कार्यक्रम में मंत्री ने कहा कि परंपरा से वसंती एवं शारदीय फसल शब्द का उपयोग करते रहे हैं, क्योंकि रबी और खरीफ आयातित शब्दावली है.
इसलिए कृषि के विद्यार्थियों को कृषि से जुड़े पारंपरिक शब्दों के इस्तेमाल करने की शुरुआत करनी चाहिए व पाठ्यक्रम में अंगीकार करना चाहिए.
मखाना उत्पादन की उपलब्धि और शिक्षा-संस्कृति पर विचार
उद्घाटन के अवसर पर कृषि मंत्री ने यह प्रसन्नता व्यक्त की कि बिहार संपूर्ण विश्व का 80 प्रतिशत से अधिक मखाना का उत्पादन करता है और आज मखाना की पहली खेप में सात कंटेनर ऑस्ट्रेलिया पहुंची है. मखाना के इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन से यह सत्यापित हो गया है कि केंद्र सरकार की मखाना संवर्धन की नीति से इसकी खेती को बढ़ावा मिला है.
उन्होंने कहा कि जिसको अपने देश और भाषा पर गर्व और गौरव नहीं है, वह पशु समान है. उन्होंने कहा कि जब शिक्षा भारतीयता से जुड़ेगी तभी भारत विकसित होगा. भारत की समृद्ध परंपरा पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए मंत्री ने कहा कि भारतीय परंपरा और भारतीय संस्कृति केवल मानव जाति के कल्याण की बात नहीं करती, बल्कि सभी जीवों के कल्याण की बात करती है और इसीलिए वसुधैव कुटुंबकम की संकल्पना यहां दी गयी है.
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उन्होंने कहा कि इस कार्यशाला में खुलकर संवाद होना चाहिए कि कैसे कृषि के पाठ्यक्रम का भारतीयकरण किया जाए तथा भारतीय आवश्यकता के अनुसार कैसे कृषि विकसित की जाए? उन्होंने यह प्रसन्नता व्यक्त की कि अब नई जनरेशन में, खासकर 90 के दशक के बाद जो जनरेशन दुनिया में आई है, वह अधिक जिज्ञासु है और वह सवाल खड़ा कर रही है.
लेकिन हम सभी का दायित्व बनता है कि उनसे सफल संवाद करके उनकी जिज्ञासा को पूरा करें.
कुलपति और डीएम के विचार
विश्वविद्यालय की सार्थकता तभी है जब वह समाज के लिए कुछ करे: कुलपति. इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो कामेश्वर नाथ सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सीयूएसबी में कृषि विज्ञान का पाठ्यक्रम खोलने का उद्देश्य केवल कृषि में सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री देना नहीं, बल्कि किसानों हेतु सफल प्रयोग स्थापित करना है.
एक मॉडल स्थापित करना है जिससे कैंपस कम्युनिटी को समृद्ध कर सकें. विश्वविद्यालय की सार्थकता तभी है जब वह समाज के लिए कुछ करे.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकसित भारत के लिए और आत्मनिर्भर भारत के लिए आत्मनिर्भर विश्वविद्यालय भी होना चाहिए और सीयूएसबी इस दिशा में प्रयासरत है. इस अवसर पर गया के डीएम शशांक शुभंकर ने कृषि के संबंध में अपने विचार रखे और गया जिले में कृषि के विकास से संबंधित योजनाओं का परिचय दिया.
एनईपी-2020 का क्रियान्वयन और तकनीकी सत्र
एनईपी-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए भारतीय भाषा समिति द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला. दो दिवसीय कार्यशाला में देश के विभिन्न केंद्रीय एवं राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों तथा अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों से आए विषय विशेषज्ञों, शिक्षाविदों एवं कृषि वैज्ञानिकों ने सहभागिता की.
कार्यक्रम के तकनीकी सत्र-प्रथम में भारतीय भाषा समिति के शैक्षणिक समन्वयक डॉ चंदन श्रीवास्तव ने कृषि विज्ञान के स्नातक एवं स्नातकोत्तर कार्यक्रमों के पाठ्यक्रमों, विषयों, तकनीकी शब्दावली तथा संदर्भ पुस्तकों के भारतीय भाषाओं में मानचित्रण की विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की. कार्यक्रम में भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय की संयुक्त सचिव डॉ रचना विश्वकर्मा ने अपने संबोधन में भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के विस्तार तथा एनईपी-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए भारतीय भाषा समिति द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला.
विशेषज्ञों ने भारतीय भाषाओं में कृषि शिक्षा, पाठ्यक्रमों एवं संदर्भ पुस्तकों के मानचित्रण, तकनीकी शब्दावली के मानकीकरण तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री के विकास पर अपने सुझाव साझा किए. कार्यक्रम के समन्वयक डॉ हेमंत कुमार सिंह ने सभी अतिथियों एवं विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के उद्देश्यों एवं रूपरेखा पर प्रकाश डाला.
आयोजन सचिव डॉ ए विश्वास ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया. इस अवसर पर विश्वविद्यालय के डीन (कृषि) डॉ एपी सिंह, कुलानुशासक, डीएसडब्ल्यू, विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं, प्रशासनिक अधिकारी एवं बड़ी संख्या में प्रतिभागी उपस्थित रहे.
