सेमिनार में मुख्य रूप से कैलाश मानसरोवर व अन्य शिखरों से प्रवाहित होनेवाली छोटी-छोटी नदियों व जल धाराओं के अवरोधकों को समाप्त करने व पानी के विभिन्न स्रोतों के संरक्षण की नसीहत मौजूद भिक्षुओं को दी गयी. सेमिनार में हिमालयन क्षेत्र में स्थित काग्यू पंथ के विभिन्न बौद्ध मठों के प्रभारियों के साथ ही विभिन्न देशों के करमापा के अनुयायी भी शामिल हुए.
पहाड़ों से निकले जलस्रोतों का संरक्षण बेहद जरूरी
बोधगया: विश्व जल दिवस के अवसर पर बुधवार को तेरगर मोनास्टरी में जल प्रबंधन विषय पर तीन दिवसीय सेमिनार का शुभारंभ हुआ. 17वें ग्यालवा करमापा उज्ञेन त्रिनले दोरजी ने इस मौके पर पानी की बचत करने, पानी को प्रदूषित होने से बचाने व मुख्य रूप से हिमालय के विभिन्न पहाड़ियों से निकलने वाले जलस्रोतों को […]

बोधगया: विश्व जल दिवस के अवसर पर बुधवार को तेरगर मोनास्टरी में जल प्रबंधन विषय पर तीन दिवसीय सेमिनार का शुभारंभ हुआ. 17वें ग्यालवा करमापा उज्ञेन त्रिनले दोरजी ने इस मौके पर पानी की बचत करने, पानी को प्रदूषित होने से बचाने व मुख्य रूप से हिमालय के विभिन्न पहाड़ियों से निकलने वाले जलस्रोतों को संरक्षित करने का संदेश दिया.
आपदा प्रबंधन पर दिया विशेष जोर: करमापा ने पिछले दिनों नेपाल में भूकंप से हुई तबाही का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें इस बात के लिए हमेशा तैयार रहना होगा कि किसी भी वक्त भूकंप व आगजनी जैसी आफत दस्तक दे सकती है. इससे बचने के लिए करमापा ने सभी बौद्ध मठों में 30-40 लोगों की टीम तैयार करने व उन्हें मुकम्मल ट्रेनिंग देकर हर वक्त तैयार रहने की सलाह बौद्ध मठ प्रभारियों को दी है. उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन टीम किसी खास ड्रेस में तैनात रहे व मुश्किल घड़ी में अपनी क्षमता का परिचय देते हुए संबंधित बौद्ध मठों में मौजूद लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा सकें, ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए. इससे कम नुकसान होने की गुंजाइश है. सेमिनार में दोपहर बाद आपदा प्रबंधन के लिए रिहर्सल भी कराया गया. तीन दिनों तक चलने वाला सेमिनार में विभिन्न बौद्ध मठों से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किये गये कार्यों की रिपोर्ट भी मांगी गयी. सभी को जल के साथ ही पर्यावरण के संरक्षण पर बल देने की सीख करमापा ने दी.