अजय पांडेय
गया : मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक-एक कर अब तक आठ बच्चों की मौत ने स्वास्थ्य विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक को बेचैन कर दिया है. विगत गुरुवार तक सात बच्चों की मौत के मामले में मगध मेडिकल कॉलेज प्रबंधन यही मान कर चल रहा था कि इन बच्चों की मौत एइएस की वजह से हुई है, पर पटना से बीते गुरुवार को ही आयी मेडिकल टीम के सदस्यों ने स्पष्ट कर दिया कि अब तक जिन बच्चों की मौत हुई है, उनमें किसी में भी एइएस के लक्षण नहीं मिले हैं, इसलिए उनकी मौत को एइएस की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
इसी वजह से शुक्रवार को हुई एक और बच्चे की मौत (आठवीं मौत) को अस्पताल प्रबंधन ने अज्ञात बीमारी की श्रेणी में डाल दिया़ इधर, मेडिकल एक्सपर्ट्स के नये खुलासे के बाद जिला स्वास्थ्य विभाग व प्रशासन, दोनों के कान खड़े हो गये. क्योंकि, स्थानीय अधिकारियों के लिए एइएस व जेइ कोई नयी बीमारी नहीं थी. अस्पताल व प्रशासन, दाेनों इस बीमारी से निबटने के लिए कमोबेश तैयार थे. पर, ‘अज्ञात एइएस’ ने सबको बेचैन कर दिया. इस बीमारी के आगे अब तक की सारी तैयारी नाकाफी साबित हो गयी.
नवादा व औरंगाबाद में बच्चों की मौत ने बढ़ायी और चिंता : जेइ व एइएस के पिछलेवर्षों के रेकॉर्ड का अध्ययन करने पर यह साफ है कि इन दोनों ही बीमारियों के वायरस गंदे परिवेश में पनपे व पोषित हुए हैं.
कीचड़, मुरगे-मुरगियों के दरबे या सूअर के बाड़े इनके वायरस के पलने-पनपने के लिए अनुकूल माहौल रहे हैं और ऐसा परिवेश गया के सुदूरवर्ती गांव-देहात से लेकर नवादा व औरंगाबाद तक में मिला है. इसी वजह से जेइ व एइएस से नवादा व औरंगाबाद के बच्चे भी इनकी चपेट में आ गये. लेकिन, खतरे की घंटी ‘अज्ञात एइएस’ के संदर्भ में भी है.
क्योंकि, इस बीमारी से नवादा व औरंगाबाद के भी बच्चों की मौत हो चुकी है. अगर, आठ बच्चों की मौत का विश्लेषण करें, तो यह साफ है कि ‘अज्ञात एइएस’ का जो वायरस गया क्षेत्र में पनप रहा है, वह औरंगाबाद व नवादा में भी पनप रहा है. वहां के बच्चों की जांच रिपोर्ट में इस इनके लक्षण एक जैसे बताये गये हैं.
इससे स्पष्ट है कि गया से जुड़ी औरंगाबाद व नवादा की पट्टी इस अज्ञात बीमारी के वायरस के लिए अनुकूल है. इसमें एक बात और महत्वपूर्ण है कि मरनेवाले आठों बच्चों में बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधी क्षमता एक जैसी पायी गयी है. एेसे में जरूरी यह है कि वायरस के पनपने के माहौल का अध्ययन किया जाये और उसे पनपने से ही रोका जाये, क्योंकि वायरस के अटैक के बाद तो देखा जा ही चुका है कि बच्चों पर किसी दवा या ट्रीटमेंट का असर नहीं हो रहा है.
