पारा लुढ़कते ही तिलकुट के कारोबार में उछालफोटो: सनत जी के पास. दुकानदार विद्यानंद प्रसाद व तिलकुट कूटते कारीगर.गया शहर व आसपास के बाजारों में तिलकुट की कई अस्थायी दुकानें भी खुलींसादा तिलकुट 150 से लेकर 230 रुपये प्रति किलो व खोये का तिलकुट 280 रुपये प्रति किलो संवाददाता, गयाठंड की दस्तक के बाद से ही गया शहर में तिलकुट के कारोबार में भी तेजी आयी है. वैसे तो गया में वर्ष भर तिलकुट की बिक्री होती है, लेकिन मकर संक्रांति को लेकर तिलकुट की मांग बढ़ जाती है. कारोबार में आयी तेजी के बाद गया शहर व आसपास के बाजारों में तिलकुट की स्थायी दुकानों के अलावा कई अस्थायी दुकानें भी खुल गयी हैं. वहीं, सैकड़ों कारीगरों को भी रोजगार मिल रहा है. गया के अलावा डंगरा व टिकारी के तिलकुट की भी अधिक मांग है. यहां सादा तिलकुट के अलावा खोये का भी तिलकुट बनाया जाता है. इस साल चीनी व गुड़ सादा तिलकुट 150 से लेकर 230 रुपये प्रति किलो व खोये का तिलकुट 280 रुपये प्रति किलो बिक रहा है. वहीं, टिकारी व डंगरा में बननेवाले गुड़ के तिलकुट अपनी साेंधी खुशबू के कारण प्रसिद्ध है. सर्दी के मौसम में तिलकुट स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है. मिल्क फ्री (बिना दूध) इस मिठाई में किसी तरह के तेल या वनस्पति का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. तिल का तासीर गर्म होने के कारण हर वर्ग के लोग ठंड के मौसम में इसे खाना पसंद करते हैं. तिलकुट के लिए कानपुरी तिल की मांग अधिक है, क्योंकि, इसकी क्वालिटी सबसे अच्छी होती है. हालांकि, लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस व झारखंड के डालटेनगंज से भी तिल मंगायी जाती है. कई जगहों पर तो बिहार के तिल का भी उपयोग किया जाता है. तिलकुट बनाने के तरीकेचीनी की चाशनी बना कर उसे साफ करने के लिए एक खंभे में खूंटी के सहारे टांग दिया जाता है. उसके बाद पतली सोरी बना कर उसे साफ स्थल पर ठंडा होने के लिए डाल दिया जाता है. चीनी की सोरी को टुकड़ा कर उसे धोई तिल में डाल कर गर्म किया जाता है. गर्म होने के बाद सभी टुकड़े को तिल में एक साथ गूंथा जाता है. उसके बाद उसका लोई बना कर कारीगर द्वारा कूट कर तिलकुट तैयार किया जाता है. करीब 25 लोढ़ा (मूसल) मारने के बाद ही खस्ता तिलकुट तैयार हो पाता है. गया में चीनी, गुड़ व खोया का तिलकुट बनाया जाता है. गया से कई प्रदेशों में जाता हैं तिलकुटगया से झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व बिहार के अन्य जिलों में तिलकुट भेजा जाता है. इस व्यवसाय से जुड़े लालजी प्रसाद बताते हैं कि सरकार की तरफ से थोड़ी भी सहायता मिले, तो तिलकुट का व्यवसाय विदेशों में भी अपनी एक अलग पहचान बना सकता है. उन्होंने कहा कि हर साल दिल्ली के प्रगति मैदान में लगनेवाले व्यापार मेले में भी यहां के व्यापारियों द्वारा स्टॉल लगाया जाता है. डेढ़ महीने की कमाई से खाते हैं साल भर दिसंबर से लेकर 15 जनवरी तक तिलकुट की मांग सबसे अधिक होती है. इस डेढ़ महीने की कमाई से साल भर का खर्च निकल जाता है. इस बार कारीगर व लेबर की मजदूरी ज्यादा है, लेकिन इससे व्यापार अच्छा होने के कारण कमाई पर कोई असर नहीं पड़ रहा है. ज्यादातर अस्थायी तिलकुट दुकानों में लेबर व कारीगर के रूप में परिवार के सदस्य ही काम करते हैं, इस कारण इन दुकानदारों का पैसा बच जाता है. बड़े दुकानों में ही बाहर से कारीगर व लेबर बुलवाया जाता है. विद्यानंद प्रसाद, दुकानदार
पारा लुढ़कते ही तिलकुट के कारोबार में उछाल
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