एक जमाना था जब हर गांवों या कस्बों में एक आवाज सुनाई देती थी. आओ बच्चों एक पैसे में दिल्ली का कुतुबमिनार देखो. आगरे का ताजमहल और दिल्ली का इंडिया गेट, मुंबई का गेटवे ऑफ इंडिया के अलावा लालकिला, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन के साथ ही कई अन्य इमारतों को बच्चे एक ही बक्से में बने पांच-छह छिद्रों से बच्चे आंखें सटा कर देखते थे. उनके लिए वह काफी कौतुहल भरा क्षण होता था. हर बच्चा बाइसकोप में इन इमारतों को देखने के लिए बेचैन रहता था. लेकिन अब के जमाने में बाइसकोप किसी गुजरे जमाने की बात हो गयी है. लोग टीवी, इंटरनेट या अन्य साधनों से बाइसकोप में दिखायी जाने की तसवीर से अच्छी तसवीर देख रहे हैं, लेकिन जो मजा बाइसकोप में देखने में था वह इसमें नहीं आता. बाइसकोप की बाते तो अब पुरानी पड़ गयी है. काफी समय बाद नवादा में बाइसकोप दिखा, तो आज के जमाने के बच्चों भी अपने को नहीं रोक पाये.
दिल्ली का कुतुबमिनार देखो
एक जमाना था जब हर गांवों या कस्बों में एक आवाज सुनाई देती थी. आओ बच्चों एक पैसे में दिल्ली का कुतुबमिनार देखो. आगरे का ताजमहल और दिल्ली का इंडिया गेट, मुंबई का गेटवे ऑफ इंडिया के अलावा लालकिला, संसद भवन, राष्ट्रपति भवन के साथ ही कई अन्य इमारतों को बच्चे एक ही बक्से में […]
