गया : मोक्ष व ज्ञान की नगरी गया के शहरी इलाके में अतिक्रमण की समस्या नासूर बन चुकी है. शहरी क्षेत्र के सौंदर्यीकरण को लेकर जवाबदेह निगम व जिला प्रशासन के अधिकारी अतिक्रमण हटाने के नाम पर फुटपाथी दुकानदारों को निशाना बनाते हैं.निगम व जिला प्रशासन तभी जागता है जब हाइकोर्ट के चाबुक उसे पड़ती है. हाइकोर्ट के आदेश के बाद निगम व जिला प्रशासन संयुक्त रूप से अतिक्रमण के खिलाफ ड्राइव चलाता है. लेकिन, शहर में अतिक्रमण के कई ऐसे मामले हैं जिसे निबटने में प्रशासन अब तक फेल रहा है.
फैलता जा रहा अतिक्रमण का मकड़जाल
गया : मोक्ष व ज्ञान की नगरी गया के शहरी इलाके में अतिक्रमण की समस्या नासूर बन चुकी है. शहरी क्षेत्र के सौंदर्यीकरण को लेकर जवाबदेह निगम व जिला प्रशासन के अधिकारी अतिक्रमण हटाने के नाम पर फुटपाथी दुकानदारों को निशाना बनाते हैं.निगम व जिला प्रशासन तभी जागता है जब हाइकोर्ट के चाबुक उसे पड़ती […]

इसमें कुछ मामले हाइकोर्ट में चल रहे हैं, तो कुछ मामले ऐसे हैं जो आज न कल हाइकोर्ट पहुंच ही जायेंगे. कहा जाये तो गया के अतिक्रमण को लेकर निगम व जिला प्रशासन से ज्यादा हाइकोर्ट परेशान है. ऐसे में प्रभात खबर की टीम ने शहर में ऐसे मामलों का जायजा लिया. आशीष की रिपोर्ट …
जांच रिपोर्ट से शुरू हो जाती है गड़बड़ी
नगर निगम कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार शहर के विभिन्न वार्डों से संबंधित अतिक्रमण के 40 से ज्यादा मामलों के आवेदन उसे प्राप्त हुए हैं. इसमें कुछ मामलों में जांच चल रही है तो कुछ मामला अटका है. नगर निगम क्षेत्र में अतिक्रमण का मामला निगम के जिम्मे तो सरकारी जमीन पर अतिक्रमण का मामला अंचलाधिकारी के जिम्मे हैं.
असल में अतिक्रमण के मामले में कार्रवाई नहीं होने के पीछे एक बड़ा कारण है शुरुआती जांच रिपोर्ट. अतिक्रमण का मामले में कनीय अभियंता व राजस्व कर्मी पैसा लेकर जांच रिपोर्ट बनाते हैं. इतना ही नहीं अमीन भी नानी के दौरान गलत रिपोर्ट बनाता है. यही से सारा मामला उलझता चला जाता है.
फल्गु नदी समेत कई नालों पर लोगों ने कर रखा है अवैध कब्जा
क्या कोर्ट के चाबुक पर ही होगी कार्रवाई ?
झोंपड़ियां बनती गयीं, प्रशासन देखता रहाकरीमगंज ओवरब्रिज के नीचे पिछले 10 वर्षों से खानाबदोश लोगों का एक समूह 10 से 12 झोंपड़ियों में रह रहा है. सरकारी जमीन पर बने इन अवैध झोंपड़ियों को लेकर प्रशासन पूरी तरह से खामोश बना हुआ है. शुरू में एक से दो झोंपड़ी बने, लेकिन इस ओर प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया.
समय बीतने के साथ झोंपड़ियां बढ़ते चली गयीं. जिस जमीन पर यह झोंपड़ी बनी है उसके ठीके पीछे रेलवे का र्क्वाटर है. करीमगंज ओवरब्रिज के नजदीक ही शहर के एक नामचीन स्कूल भी है, जहां प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा नेताओं के बच्चे पढ़ते हैं.
प्राय: हर दिन इस रूट से सरकारी गाड़ियों की आवाजाही होती है लेकिन इन अवैध झोंपड़ियों को हटाने की फुरसत प्रशासन को नहीं है. हालांकि यह भी तब हटेगा जब शहर का कोई नागरिक कोर्ट में जनहित याचिका डालेगा. इसके बाद प्रशासन के लिए यह कहना बहाना हो जायेगा कि अतिक्रमण कोर्ट के आदेश पर हटाया जा रहा है.
नदी में फेंका जा रहा घरों से निकलने वाला मलबा भी
फल्गु जब खत्म हो जायेगी, तब प्रशासन की नींद टूटेगी
मोक्षदायिनी फल्गु नदी तो अतिक्रमणकारियों के कारण रोजाना दम तोड़ रही है. नदी का रकबा धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. प्रतिज्ञा संस्था के संरक्षक बृजनंदन पाठक द्वारा नदी को अतिक्रमण मुक्त कराने को लेकर दायर याचिका के बाद ही पिछले कुछ सालों में प्रशासन की हल्की नींद खुली है. फल्गु के दोनों ओर प्रशासन ने सीमांकन कराया व पिलर गाड़ा. लेकिन यह कार्रवाई ऊंट के मुंह में जीरा के सामान साबित हुई है.
पंचायती अखाड़ा, कंडी नवादा, लखीबाग, सलेमपुर, भुसुंडा, ब्राहृम्णी घाट, नादरागंज, पितामहेश्वर आदि फल्गु से सटे इलाके में नदी को खत्म कर बड़े बड़े मकान बनाये जा रहे हैं. मानपुर की ओर से कई मकान फल्गु नदी के बीचों बीच तक पहुंच चुके हैं. इसमें नाले का पानी तो गिरता है फल्गु के कोख में बनाये जा रहे घरों से निकलता मलबा भी नदी में ही फेंका जा रहा है. पंचायती अखाड़ा पंपिंग केंद्र से सटे इलाका में फल्गु नदी में पक्की सड़क बना दी गयी है.
मनसरवा : मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी नहीं हटा अतिक्रमण
वर्ष 2016 से पहले शहर के लोगों के बीच मनसरवा नाला की चर्चा उतनी नहीं होती थी जो अब होने लगी है. 2016 में जब बरसात के पानी ने मनसरवा का जल स्तर इतना बढ़ा दिया कि नाले का पानी आसपास के इलाके को ही डुबाे दिया था. इस नाला पर बने पंत नगर, मयूर विहार, मधुसूदन कॉलोनी आदि इलाकों में रहने वाले हजारों परिवार करीब एक सप्ताह तक घरों में कैद हो गये थे.
हर घर में नाली का पानी घुस आया था. हालात इतने खराब हो गये कि खुद प्रदेश के सीएम नीतीश कुमार को आना पड़ा. उन्होंने घोषणा की मनसरवा को अतिक्रमण मुक्त बनाया जायेगा. सीएम की घोषणा के बाद प्रशासन ने यहां अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की. लेकिन समय के साथ प्रशासन का ध्यान इस ओर से हटता चला गया है. यह नाला अभी भी अतिक्रमण की चपेट में है. पिछले दो सालों में अतिक्रमण हटाने के नाम पर प्रशासन ने कुछ दीवारें घरों की दीवारें तोड़ी हैं.
निगम के परिसर में ही अतिक्रमण हटाने की कोई मंशा नहीं
नगर निगम कार्यालय के ठीके पीछे कभी चिल्ड्रेन पार्क हुआ करता था. यहां महादलित समुदाय के लोगों का परिवार पिछले चार दशक से अधिक समय से अवैध झोंपड़ी बना कर रहता आ रहा है. लेकिन, इन्हें हटाने की हिम्मत निगम आज तक नहीं जुटा सका है. हालांकि कुछ साल पहले यहां रहे परिवारों को गेवाल बिगहा स्थित दलित बस्ती में बसाने की योजना बनी थी. इसके लिए वार्ड पार्षद व निगम के अधिकारियों का एक टीम दलित बस्ती का मुआयना किया था.
तय हुआ था कि क्षतिग्रस्त मकानों की मरम्मत करायी जायेगी ताकि इन परिवारों को वहां बसाया जा सके.लेेकिन ये लोग यहां से जाने को तैयार नहीं हुए. यह पिछले कई सालों से राजीव आवास योजना व हाउसिंग फॉर ऑल योजना का लाभ दिलाने की मांग कर रहे हैं. हालांकि इस मामले का एक पहलू यह भी कि निगम के कई पदाधिकारियों का इन परिवारों को संरक्षण है. इतना ही नहीं कई वार्ड पार्षद भी इन परिवारों के नाम पर राजनीति करते हैं.
क्या कहते हैं अधिकारी
शहर के लोगों की पीड़ा
शहर में अतिक्रमण की समस्या गंभीर हो चुकी है. सबसे दुखद यह है कि शहर की धरोहर फल्गु नदी व गांधी मैदान का अतिक्रमण कर उसे खत्म करने की कोशिश हो रही है. इस मामले में कोर्ट में दायर याचिका के बाद ही कुछ हरकत प्रशासन ने दिखायी है. लेकिन, अब भी फल्गु नदी पूरी तरह से अतिक्रमणकारियों की चपेट में है. आखिर इस मामले में क्यों नहीं सजगता दिखायी जा रही है. हालात दिन-प्रतिदिन खराब होने से बेहतर की प्रशासन इस समस्या का अविलंब निदान करें.
बृजनंदन पाठक, संरक्षक प्रतिज्ञा संस्था
गया शहर पिछले कई वर्षों से अतिक्रमण की मार झेल रहा है. सेंट्रल बिहार चैंबर ऑफ कॉमर्स समय-समय पर प्रशासन के अलावा प्रदेश के मुख्यमंत्री को इस समस्या को लेकर ध्यान आकृष्ट कराता रहा है. लेकिन, अब जरूरत यह है कि शहर की बेहतर तरीके से प्लानिंग हो. अतिक्रमण के मामले पर हल्की भी लापरवाही नहीं बरती जाये. हमें समझना होगा कि अतिक्रमण से न सिर्फ शहर, बल्कि गया का समाज भी हर दिन प्रभावित हो रहा है.
डॉ कौशलेंद्र प्रताप, अध्यक्ष चैंबर ऑफ कॉमर्स
गया शहर का अतिक्रमण वाकई लाइलाज हो चुका है. अब इस पर बहाना बनाने के बजाय प्रशासन को अभियान चला कर कार्रवाई करने की जरूरत है. ऐसा कोई वार्ड व इलाका नहीं है, जहां अतिक्रमण के मामले नहीं हैं. लेकिन, दिक्कत यह है कि कुछ लोगों के कारण शहर में अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई रुक जाती है. शहर के लोगों को इसमें सहयोग करना चाहिए.
अजीत, कारोबारी
क्या कहते हैं अधिकारी
शहर में अतिक्रमण के मामले पर निगम कार्रवाई करता है. यह सुनिश्चित करना होता है कि जिस जमीन पर अतिक्रमण है वह सरकारी है, केसरी हिंद की या निगम की है. अगर नगर निगम की जमीन होती है, तो संबंधित जेइ से जांच रिपोर्ट मिलने के बाद कार्रवाई होती है. इसके लिए जिला प्रशासन के साथ संयुक्त रूप से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाती है.
दिनेश सिन्हा, उप नगर आयुक्त
अंचल कार्यालय में अतिक्रमण से संबंधित जो भी मामले आते हैं, उसे प्राथमिकता से निबटाने की हमारी कोशिश रही है. अतिक्रमण सिर्फ प्रशासनिक स्तर से नहीं सुलझाया जा सकता. इसके लिए लोगों को भी सहयोग करना होगा. अगर लोग भी थोड़ी समझदारी दिखाये, तो अतिक्रमण का मामला हल हो सकता है.
दिलीप कुमार, सीओ, नगर प्रखंड