नेकी व दान-पुण्य करने से गरीबों व असहायों में भी रहती है खुशी
गया : पाक रमजान के मौके पर जुम्मे की नमाज पढ़ने व रोजा रखनेवालों को विशेष सवाब मिलता है. इनकी गुनाहों की भी माफी होती है. ये बातें कर्बला के समीप स्थित मदीना मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद अफरोज आलम ने कहीं. उन्होंने बताया कि रमजान में पड़नेवाले सभी जुम्मे का महत्व एकसमान होता है. हालांकि उन्होंने बताया कि आखरी जुम्मा को जुम्मातूल विदा कहा जाता है. उन्होंने बताया कि आखरी जुम्मे के बाद रमजान की विदाई होने लगती है. इससे लोगों में मायूसी छा जाती है व विदा होने का दुःख होता है.
इमाम मोहम्मद अफरोज ने बताया कि रमजान को तीन हिस्सों में बांटा गया है. पहला 10 दिन रहमत का होता है. इस अवधि में अल्लाह ताला से नमाज पढ़नेवालों व रोजा रखनेवालों को सवाब मिलता है. दूसरा 10 दिन मगफिरत कहलाता है. इस अवधि में गुनाहों की माफी होती है. तीसरा 10 दिन जहन्नम से आजादी दिलाता है. उन्होंने बताया कि यदि किसी से गुनाह होता है, तो इस महीने में लोगों को माफी के साथ-साथ जहन्नम से निजात भी मिलती हैं. उन्होंने बताया कि रमजान पर्व आने के साथ-साथ लोगों में खुशियां लेकर आता है. उन्होंने बताया कि विशेषकर मुस्लिम संप्रदाय में उत्सव का माहौल बन जाता है.
इसलिए सब लोग इस पर्व के आने का इंतजार करते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि रमजान त्योहार पर नेकी व दान-पुण्य करने से इसका इंतजार गरीबों व असहायों को भी रहता है. क्योंकि इस पर्व में लोगों को विशेष खैरात का लाभ मिलता है. उन्होंने बताया कि रोजेदार व मस्जिदों में नमाज पढ़नेवाले लोग गरीबों व असहायों के बीच खैरात बांटना अल्लाह ताला का आदेश व अपना धर्म मानते हैं. पूछने पर मौलाना साहब बताते हैं कि रमजान के मौके पर सभी मस्जिदों में अलग-अलग दिनों का तरावीह होता है. तरावीह में श्रद्धालुओं को कुरान का पाठ सुनाया व पढ़ाया जाता है. इससे वे नेकी के रास्ते पर चलने का संकल्प लेते हैं.
इफ्तार से समाज में बढ़ता है भाईचारा : मौलाना साहब बताते हैं कि रमजान के मौके पर प्रतिदिन अपना रोजा रोजेदार इफ्तार करके खोलते हैं. उन्होंने बताया कि इफ्तार में आस-पास के लोग एक-दूसरे के साथ शरीक होते हैं. इससे न केवल समाज में भाईचारा बढ़ता है, बल्कि ऊंच-नीच व अमीरी-गरीबी का भेद भी मिटता है. रमजान पर्व सभी धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के साथ मिलाने का काम भी करता है.
