आधार, पीला व लाल कार्ड में उलझाते हैं कर्मचारी

गर्भवती महिलाएं निजी संसाधनों के सहारे आती हैं अस्पताल मगध मेडिकल कॉलेज के पास महज दो एंबुलेंस गया : मरीजों के लिए एंबुलेंस बुक कराना किसी मुसीबत से कम नहीं है. रविवार को बांकेबाजार के जमुआरा निवासी विनय कुमार ने अपने चाचा के लिए एंबुलेंस बुक कराने की कोशिश की. उन्होंने 102 नंबर डायल किया. […]

गर्भवती महिलाएं निजी संसाधनों के सहारे आती हैं अस्पताल

मगध मेडिकल कॉलेज के पास महज दो एंबुलेंस
गया : मरीजों के लिए एंबुलेंस बुक कराना किसी मुसीबत से कम नहीं है. रविवार को बांकेबाजार के जमुआरा निवासी विनय कुमार ने अपने चाचा के लिए एंबुलेंस बुक कराने की कोशिश की. उन्होंने 102 नंबर डायल किया. किस्मत अच्छी थी. एक बार ही नंबर लग गया. उधर से कर्मचारी ने मरीज का ब्योरा मांगा. विनय कुमार ने बताया कि उनके चाचा नरेश प्रसाद (उम्र 43 साल) को लेकर जाना है. कर्मचारी ने उनका आधार नंबर मांगा. आधार नंबर देने के बाद कहा कि बुकिंग की जा रही है. इसके बाद पूछा गया कि क्या मरीज के पास लाल या पीला कार्ड है. विनय ने कहा कि उनके पास कोई कार्ड नहीं है. तो उधर से बताया गया कि कार्ड नहीं होने पर 10 रुपये प्रति किलोमीटर चार्ज देना होगा. इसके बाद बुकिंग की गयी.
हर बार व्यस्त मिलती है लाइन : वजीरगंज बाजार इलाके में रहनेवाले अभिषेक शर्मा के मुताबिक 102 को लेकर उनका अनुभव बहुत खराब है. रविवार की शाम उन्होंने 102 डायल किया. उनके मुताबिक छह बार तक लाइन लगातार व्यस्त मिलता रहा. उन्हें अपने पिता को लेकर मगध मेडिकल काॅलेज जाना था. उन्होंने बताया कि यह कोई पहली बार नहीं है. इससे पहले भी एक बार अपनी दादी के लिए उन्होंने 102 का प्रयोग करना चाहा था. उस वक्त भी कई बार ट्राइ करने के बाद फोन लगा था. उसके बाद भी उन्हें काफी देर तक होल्ड पर रख दिया गया. अंत में परेशान हो कर उन्होंने मुहल्ले के एक व्यक्ति से मदद ले कर उनकी प्राइवेट गाड़ी से अस्पताल गये.
आखिर प्राइवेट गाड़ी का ही मिला सहारा : कौटिल्यपूरी इलाके के सुरेश कुमार के मुताबिक उन्हें भी रविवार को एंबुलेंस की जरूरत थी. तीन बार तक रूट व्यस्त सुनने के बाद चौथी बार में फोन लग गया. उनसे भी सारी जानकारियां मांगी गयी. मरीज व उसके साथ जाने वाले का पूरा ब्योरा लेने के बाद सुरेश को होल्ड पर रख कर स्टेटस चेक करने की बात कही गयी. इसमें 10 मिनट निकल गये, लेकिन बात नहीं बनी. परेशान सुरेश ने प्राइवेट कार का प्रयोग किया और अस्पताल गये.
बहुत कम होता है शव वाहनों का : जिले में शव ले जाने के लिए चार शव वाहन हैं. दो मगध मेडिकल काॅलेज के पास और दो जय प्रकाश नारायण अस्पताल के पास. माॅनिटरिंग की जिम्मेदारी जिला स्वास्थ्य समिति के पास है. लेकिन हकीकत यह है कि शायद ही किसी को पता भी है कि अस्पताल में शव वाहन है. स्वास्थ्य विभाग के ही एक पदाधिकारी की मानें तो एंबुलेंस को लेकर सरकार के स्तर पर भी बहुत शिथिलता है. यही कारण है कि किसी को पता ही नहीं कि अस्पताल से शव को ले जाने के लिए शव वाहन दिये जाते हैं. होना यह चाहिए कि अस्पताल में हर जगह पर एंबुलेंस और शव वाहन से जुड़ी जानकारी होनी चाहिए.
मगध मेडिकल काॅलेज व अस्पताल में तो इसका थोड़ा बहुत प्रयोग है. यहां दुर्घटना में मौत होने के बाद यह गाड़ी उपलब्ध करायी जाती है. सामान्य मौत के केस में यह सुविधा नहीं मिलती. लेकिन जय प्रकाश नारायण अस्पताल में इसका कोई प्रयोग नहीं है. यहां तो मरीजों की मौत की संख्या कम होती है. कारण उनका रेफर कर दिया जाना. गंभीर स्थिति वाले मरीज को एंबुलेंस देकर रेफर कर दिया जाता है.
गर्भवती महिलाओं का संघर्ष :एंबुलेंस की सेवा सरकार ने गर्भवती,बुजुर्ग,बच्चों और दुर्घटना के शिकार लोगों के लिए मुफ्त कर रखी है लेकिन सच्चाई यह है कि दुर्घटना के मामले को छोड़ दें तो बाकी सभी श्रेणियों में जरूरत मंदों को कोई लाभ नहीं मिलता. बेलागंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए काम करने वाली एक आशा (मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता) के मुताबिक गर्भवती महिलाओं के लिए एंबुलेंस सेवा नहीं मिलती, ऐसा नहीं है. ऐसा बहुत कम होता है. परेशानी यह है कि प्रखंड स्तर पर एंबुलेंस की संख्या कम है और जिस वक्त प्रसव पीड़ा शुरू हो जाती है तो उस वक्त एंबुलेंस का इंतजार नहीं किया जा सकता है. महिला का प्राइवेट गाड़ी की मदद से अस्पताल भेजा जाता है. इसके ठीक उलट रंगबहादुर रोड में रहने वाले विवेक कुमार ने कहा कि गांव में एंबुलेंस के नहीं मिलने के पीछे सभी की मिली भगत रहती है. जान बुझ कर एंबुलेंस नहीं दिया जाता है. अस्पताल के पास ही कुछ दलाल सक्रिय रहते हैं जो प्राइवेट गाड़ी या एंबुलेंस रख कर कमाई करते हैं. इसमें सभी का कमीशन फिक्स होता है. कुछ महीने पहले प्रभावती अस्पताल में एक महिला ने अस्पताल के बरामदे में ही बच्चे को जन्म दे दिया था. चिकित्सकों ने कह दिया कि प्रसव पीड़ा शुरू होने के काफी देर बाद अस्पताल पहुंचने के कारण ऐसा हुआ. जबकि परिवार के सदस्यों ने कहा कि उन्हें वक्त पर एंबुलेंस नहीं मिला. फोन पर तो संपर्क हुआ ही नहीं. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जाने के बाद भी नहीं मिल सका. मजबूरी में उन लोगों ने एक अॉटो किया. आॅटो के झटके के कारण ही महिला का प्रसव जल्दी हो गया.
दो एंबुलेंस मेडिकल काॅलेज में
प्रमंडल के सबसे बड़े अस्पताल मगध मेडिकल काॅलेज का हाल यह है कि यह मात्र दो एंबुलेंस पर निर्भर है. दोनों एंबुलेंस दिन भर में एक राउंड पटना लगा ही लेती है. बहुत बार स्थिति यह होती है. अस्पताल में एक दिन में कई मरीजों को पटना पीएमसीएच रेफर करने की नौबत आती है, पता चलता है कि दोनों एंबुलेंस मरीज लेकर पटना गयी है. अब क्या करें ? अस्पताल प्रशासन के पास सीधा जवाब होता है कि एंबुलेंस पटना गया है, सरकार ने कम संख्या में दिया है तो इसमें अस्पताल का क्या दोष. मरीज के परिजनों के पास दो आॅप्शन हैं. या तो एंबुलेंस के लौटने का इंतजार करे और यदि मरीज की स्थिति गंभीर है तो प्राइवेट एंबुलेंस को छोड़ कोई दूसरा उपाय नहीं है.
इसी महीने में कुछ दिन पहले गया- टिकारी रोड में जमुने के पास एक आॅटो का एक्सिडेंट हुआ. लगभग सात लोग घायल थे. सभी को मगध मेडिकल काॅलेज में भर्ती कराया गया .उनमें से एक लड़की की स्थिति काफी गंभीर थी. इमरजेंसी वार्ड में देखने के बाद डाॅक्टर ने उसे पीएमसीएच रेफर कर दिया. अस्पताल में एक एंबुलेंस नहीं था. 102 पर कोई रिस्पांस नहीं. परिवार के लोग परेशान थे. वह तो भला हो एसडीओ सुरज कुमार सिन्हा का,जिन्होंने एंबुलेंस मुहैया कराने का प्रयास किया. एसडीओ को भी इसके लिए संघर्ष करना पड़ा. मेडिकल काॅलेज के अधीक्षक, हेल्थ मैनेजर, जिला स्वास्थ्य समिति के डीपीएम से लेकर सिविल सर्जन तक काॅल करना पड़ा. इन सब के बाद भी एक घंटे लग गये तब उस लड़की के लिए एंबुलेंस मिल सका.
कोशिश होती है कि सभी को लाभ मिले
जिले के लिए कुल 42 एंबुलेंस व चार शव वाहन हैं. एंबुलेंस का प्रयोग शहर से लेकर जिला स्तर के अस्पतालों में किया जा रहा है. कोशिश होती है कि सभी को इसका लाभ मिले. जय प्रकाश नारायण अस्पताल में दो व मगध मेडिकल काॅलेज व अस्पताल में दो शव वाहन हैं.
मनीष कुमार, डीपीएम, जिला स्वास्थ्य समिति
क्या कहती है एंबुलेंस यूनियन
एंबुलेंस यूनियन के नेता सह जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ (इंटक) के जिला सचिव श्याम कुमार ने बताया कि जिला स्तर पर चलने वाले एंबुलेंस का भुगतान अधिक से पेंडिंग नहीं है. फरवरी तक का भुगतान किया जा चुका है. मेडिकल काॅलेज में जो दो एंबुलेंस हैं. उनके भुगतान को लेकर खींचतान चल रही है. यहां मेडिकल काॅलेज प्रबंधन व जिला स्वास्थ्य समिति के बीच का मामला है . उन्होंने बताया कि एंबुलेंस की माॅनिटरिंग जिला स्वास्थ्य समिति के स्तर पर होती है,ऐसे में मेडिकल काॅलेज प्रशासन भुगतान का जिम्मा भी जिला स्वास्थ्य समिति से ही चाहता है. इसी कागजी पेंच के कारण वहां लगभग छह महीने का भुगतान बकाया है.
यह तो अब की स्थिति है. लेकिन यह भी सच है कि कई बार एंबुलेंस को धक्का देकर स्टार्ट किया जाता है. तेल के लिए मिलने वाला पेट्रो कार्ड में पैसे ही नहीं होते. अब ड्राइवर को तेल चाहिए तो उसे मिलता ही नहीं. कई बार अस्पतालों में मरीज को लेकर निकल रहे एंबुलेंस को धक्का दे कर स्टार्ट करते हुए देखा गया.

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