Darbhanga News: भारतीय आंदोलनों में महिलाओं की रही है सक्रिय भागीदारी

Darbhanga News:भारतीय आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका विषय पर विभागाध्यक्ष प्रो. संजय झा की अध्यक्षता में सेमिनार हुआ.

Darbhanga News: दरभंगा. लनामिवि के पीजी इतिहास विभाग एवं डॉ प्रभात दास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में बुधवार को भारतीय आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका विषय पर विभागाध्यक्ष प्रो. संजय झा की अध्यक्षता में सेमिनार हुआ. मुख्य वक्ता सह एमएचएम कॉलेज, सोनवर्षा सहरसा के डॉ संजीव कुमार ने कहा कि भारतीय आंदोलनों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी 1538 इ. से प्रमाणित होती है, जब रोहतासगढ़ में चंपू दाई ने अफगान सेना को रोकने का प्रयास किया. हालांकि विश्वासघात के कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. लेकिन, यह घटना महिला वीरता का प्रारंभिक उदाहरण मानी जाती है. कहा कि उरांव जनजाति की महिलाएं लगातार संघर्षरत रही और उनके सम्मान में प्रतीक चिह्न भी स्थापित किए गए. रानी सर्वेश्वरी ने सीमित सैन्य बल के बावजूद अंग्रेज अधिकारी क्लीवलैंड को पराजित किया. जिनिया भगत और उनके पिता बुद्धो भगत के नेतृत्व में हुए संघर्षों में महिलाएं अग्रिम पंक्ति में रही. 14 फरवरी को महिलाओं ने परंपरागत हथियारों के सहारे लगभग आठ घंटे तक ब्रिटिश सेना को रोके रखा. हूल विद्रोह (1855–56) में फूलो और झानो ने लगभग 400 वर्ग मील क्षेत्र में संदेशवाहक का कार्य किया. कलची और मुनिया ने महिलाओं को संगठित कर प्रशिक्षण दिया और बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संघर्ष के लिए भी तैयार किया. कई स्थानों पर महिलाओं ने पुलिस बल पर आक्रमण कर औपनिवेशिक सत्ता को खुली चुनौती दी.

19वीं सदी के उत्तरार्ध में महिलाओं की तेजी से बढ़ी भागीदारी- डॉ अभय

बीआरबी काॅलेज समस्तीपुर के डॉ अभय कुमार सिंह ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में अत्यंत महत्वपूर्ण रही. 19वीं सदी के उत्तरार्ध में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी. विदेशी वस्त्रों की होली, शराबबंदी, सामाजिक कुरीतियों के विरोध के साथ स्वदेशी आंदोलन में महिलाओं ने व्यापक सहभागिता निभाई. चरखा और खादी, सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह तथा भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं ने नेतृत्वकारी भूमिका निभायी.

सृजन, संघर्ष और परिवर्तन की मूल शक्ति रही महिलायें- प्रो. संजय

विभागाध्यक्ष प्रो. संजय झा ने कहा कि भारतीय आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका कोई सीमित या सहायक भूमिका नहीं, बल्कि सृजन, संघर्ष और परिवर्तन की मूल शक्ति रही है. कहा कि भारतीय संस्कृति में मातृभूमि, मातृभाषा, मातृशक्ति और संस्कृति को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. कहा कि शक्ति के बिना शिव शव हैं, यह कथन नारी शक्ति की अनिवार्यता को दर्शाता है. इससे पूर्व विषय प्रवेश डॉ अमीर अली खान ने कराया. मौके पर प्रो. नैयर आजम, डॉ अमिताभ कुमार, डॉ मनीष कुमार, पंकज ठाकुर, शोधार्थी प्रशांत कुमार, सिद्धार्थ कुमार, गौतम कुमार आदि मौजूद थे. संचालन डॉ मनीष कुमार तथा धन्यवाद ज्ञापन फाउंडेशन के मुकेश कुमार झा ने किया.

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Author: PRABHAT KUMAR

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