दरभंगा : मिथिला का पवित्र लोकपर्व मधुश्रावणी उत्तरार्द्ध की ओर पहुंच गया है. इसके साथ ही फिजा में लोकगीतों के बोल अनुगूंजित होने लगे हैं. पूजा के समय आंगन से उठते बोल, सायं काल सड़कों पर सुनाई पड़ रही है. पूरा वातावरण इस रंग में रंग गया है. ज्ञातव्य हो कि आगामी 5 अगस्त को इस लोकपर्व का समापन हो जायेगा. रविवार की शाम इस पर्व को लेकर पूरा श्यामा मंदिर परिसर गुलजार नजर आने लगा. जो नित्य इस मंदिर में आकर अपने डाला को नहीं सजा सकी, वे भी यहां पहुंची और परंपरागत तरीके से लोढ़े गये फूलों से अपना डाला सजाया.
इस दौरान उनके साथ उनकी सखियां भी मौजूद थीं. इस दौरान जिस मार्ग से इनकी टोली गुजरी लोक गीतों के मधुर तान से उस क्षेत्र का वातावरण मानो गुनगुना उठा. फूल लोढ़ने के दौरान नवविवाहिताओं के कंठ से फूटते किनका के आंगन बेली-चमेली, किनका आंगन गुलाब हे… जहां वातावरण में लोक गीत की मिठास घोलती रही, वहीं पूजन के दौरान बाबा यो पाबनि मोर लगिचायल, कौशिल्या सासु किछु ने पठाओल ना… सरीखे गीत सामाजिक परंपरा की याद ताजा करती रही. इस दौरान महेशवाणी, चनाई, विसहारा आदि के पारंपरिक गीत के बोल भी फूटते रहे.
